आज के हालात में भारत में कमाना बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए भी मुश्किल हो गया है। दिसंबर तिमाही के ताज़ा वित्तीय नतीजे पस्ती की हालत का दस्तावेज़ बन गए हैं। जिन आईटी कंपनियों का दायरा विदेश तक फैला हुआ है, उन तक के नतीजे उम्मीद से खराब रहे हैं। इनमें टीसीएस, इन्फोसिस, एचसीएल टेक, विप्रो, टेक महिंद्रा और एलटीआई माइंडट्री शामिल हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज़ और आईसीआईसीआई बैंक तक ने निराश किया है। रिलायंस रिटेल का धंधा दबनेऔरऔर भी

चीन पर बढ़ती निर्भरता सुनियोजित लगती है। नवंबर 2016 में नोटबंदी से हमारे एमएसएमई क्षेत्र की कमर तोड़ दी गई। जुलाई 2017 में जीएसटी आया तो छोटी व मध्यम औद्योगिक इकाइयों पर दूसरा सरकारी हमला हुआ। फिर मार्च 2020 में कोरोना महामारी में गलत लॉकडाउन के फैसले ने हज़ारों लघु इकाइयों पर ताला लगवा दिया। यह सब करते हुए सरकार मगन थी कि वह अर्थव्यवस्था का इनफॉर्मल स्वरूप खत्म कर उसे फॉर्मल बना रही है, सारी औद्योगिकऔरऔर भी

भारत को अगर अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस व जापान जैसा विकसित देश बनना है या चीन, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका व इंडोनेशिया जैसा उच्च मध्यम आय का देश भी बनना है तो मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को बढ़ाना होगा। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 साल पहले 2015 में कहा था कि 2025 तक जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा 25% पर पहुंचा देंगे। हकीकत यह है कि यह 2011-12 में जीडीपी का 17.4% हुआ करता था। 2024-25 में घटते-घटते 13.9% परऔरऔर भी

भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। पिछले दस सालों में देश का जीडीपी मार्च 2016 के ₹135.76 लाख करोड़ से 2.63 गुना होकर मार्च 2026 तक ₹357.14 करोड़ पर पहुंचने जा रहा है। जाहिर है कि देश की धन-दौलत भी बढ़ी है। लेकिन यह धन-दौलत जा कहां रही है? किसानों की आय तो दोगुना हुई नहीं! इनकम टैक्स विभाग के आंकड़ों के मुताबिक पिछले दस सालों में मध्यम वर्ग की औसत कमाई ₹10.23 लाखऔरऔर भी

आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि भारत विपुल प्राकृतिक संपदा और मानव संसाधनों के बावजूद चीन से ललकार कर बात नहीं कर पा रहा? असल में यह भारत की नहीं, देश की सत्ता पर बारह साल से कुंडली मारे बैठी मोदी सरकार की मजबूरी है। जिस तरह मोदी सरकार ट्रम्प को दो-टूक जवाब इसलिए नहीं दे पा रही क्योंकि न्यूयॉर्क की अदालत ने घूसखोसी के मामले में अडाणी की पूंछ दबा रखी है, उसी तरह अडाणी केऔरऔर भी