मोदी सरकार एक डरी हुई सरकार है। यह येनकेन प्रकारेण ऊपर से लेकर नीचे तक सत्ता के समूचे तंत्र पर कब्जा करना चाहती है। इसलिए नहीं कि इसे देश का विकास करना है, बल्कि इसलिए कि इसे अपने यारों का भला और जनधन की अबाध लूट से अपनी पार्टी व संघी तंत्र का खजाना भरते रहना है। हर खास-ओ-आम को फिर भी उम्मीद है कि सरकार बजट में आर्थिक विकास, रोज़गार सृजन और उपभोक्ता मांग बढ़ाने केऔरऔर भी

भारत का ऋण-जीडीपी अनुपात अपने-आप में ज्यादा नहीं कहा जा सकता। ब्रिक्स के मूल पांच देशों में रूस (24.8%) व दक्षिण अफ्रीका (79.5%) को छोड़ दें तो ब्राज़ील (95%) और चीन (102.3%) का ऋण-जीडीपी अनुपात हमसे ज्यादा है। विकसित देशों में अमेरिका का यह अनुपात 128.7%, ब्रिटेन का 104.8%, फ्रांस का 119.6% और जापान का 226.8% है, जबकि जर्मनी का यह अनुपात 66% है। पाकिस्तान का तो ऋण-जीडीपी अनुपात हमसे कम 71.3% है। असल दिक्कत यह हैऔरऔर भी

नए साल के बजट की बेला आ चुकी है। ऐसे में जानना ज़रूरी है कि ऊपर-ऊपर भले ही देश पहली तिमाही में जीडीपी 7.8%, दूसरी तिमाही में 8.2% और पूरे वित्त वर्ष में 7.4% की विकास दर के साथ उछलता दिख रहा हो, लेकिन सतह के नीचे तैरती और बढ़ती पस्ती गहराने लगी है। इसका सबसे बड़ा आभास देश में सरकारी ऋण और जीडीपी के बढ़ते अनुपात से मिलता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कहती रही हैंऔरऔर भी

इस समय दुनिया में भारत की स्थिति गांव में गरीब की लुगाई जैसी हो गई है जिसे हर कोई मजे में छेड़कर चला जाता है। ट्रम्प ने पहले 25% के ऊपर 25% और टैरिफ लगाकर अपनी शर्तें मनवा ली। अब 25% अतिरिक्त टैरिफ हट भी गया तो अमेरिका 25% तो लगाएगा ही। यूरोपीय संघ दूसरे तरीके से मजे ले रहा है। एक तरफ यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेर लायन कहती हैं कि यूरोपीय संघ भारतऔरऔर भी