शेयर बाज़ार आज के यथार्थ पर नहीं, बल्कि कल के ख्वाब पर चलता है। हालांकि ये ख्वाब भी हवा-हवाई नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत से निकले अनुमानों पर टिके होते हैं। अर्थव्यवस्था और कंपनियों की संभावित मजबूती ही अंततः शेयर बाज़ार की तेज़ी का आधार होती है। लेकिन अर्थव्यवस्था को अगर सब्ज़बाग पर चुनावी उड़ान भरने का साधन बना दिया जाए तो मामला बड़ा संगीन हो जाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था को कायदे से 8-9% की सालाना दर सेऔरऔर भी