ज्ञान पढ़कर पाया जा सकता है। लेकिन कौशल तो केवल अभ्यास से हासिल किया जा सकता है। यह अभ्यास किसी गुरु की देखरेख में हो तो सबसे अच्छा है। लेकिन ज़माने के सारे गुरु जब स्वार्थों से बंधे हों, तब कौशल में पारंगत होने के लिए एकलव्य ही बनना पड़ता है। नियम और अनुशासन गुरु का काम करते हैं, जबकि उनका पालन करते हुए निरंतर अभ्यास से हम हुनरमंद बनते चले जाते हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी