बीवी का हार नहीं, जिम्मेदारी का जिम्मा है बीमा
पहले जब तक गांव से ज्यादा जुड़ाव था, नौकरीपेशा तबके को जीवन बीमा की जरूरत नहीं लगती थी। भरोसा था कि जमीन-जायदाद के दम पर हारी-बीमारी से लेकर बुढ़ापे तक का इंतजाम हो जाएगा। लेकिन गांव से रिश्ता टूटता गया और ज्यादातर जोतों का आकार घटकर दो-ढाई एकड़ से कम रह गया तो अब हर कोई जीवन बीमा की सोचने लगा है। मगर, आंख पर पट्टी बांधकर। जैसे, मेरे एक हिंदी पत्रकार मित्र हैं। अंग्रेजी-हिंदी दोनों भाषाओंऔरऔर भी
गांधी स्पेशल ट्यूब्स में है कुछ खास
जिस तरह लोकतंत्र में हर शख्स को बराबर माना गया है, माना जाता है कि कानून व समाज की निगाह में हर कोई समान है, उसी तरह सुसंगत बाजार के लिए जरूरी है कि उसमें हर भागीदार बराबर की हैसियत से उतरे। यहां किसी का एकाधिकार नहीं चलता। इसलिए एकाधिकार के खिलाफ कायदे-कानून बने हुए हैं। लोकतंत्र और बाजार के बीच अभिन्न रिश्ता है। लेकिन अपने यहां लोकतंत्र और बाजार की क्या स्थिति है, हम अच्छी तरहऔरऔर भी
मुठ्ठी में भाग्य
जो व्यक्ति दिल से विनम्र, दिमाग से जिज्ञासु और मन से आशावादी होता है, किस्मत हमेशा उसका साथ देती है। जो खुद को भगवान का दुलारा मानता है, किस्मत खुद-ब-खुद उसकी चेरी हो जाती है। वह किस्मत के पीछे नहीं, किस्मत उसके पीछे भागती है।और भीऔर भी








