ये शरीर, हम और हमारा अवचेतन। अभिन्न हैं, फिर भी स्वतंत्र हैं। हम सोते हैं तो अवचेतन सुश्रुत वैद्य की तरह हमारी मरहम पट्टी में लग जाता है। शरीर तो मर्यादा पुरुषोत्त्म है। बस, हम ही बावले हैं।और भीऔर भी