नए साल के बजट की बेला आ चुकी है। ऐसे में जानना ज़रूरी है कि ऊपर-ऊपर भले ही देश पहली तिमाही में जीडीपी 7.8%, दूसरी तिमाही में 8.2% और पूरे वित्त वर्ष में 7.4% की विकास दर के साथ उछलता दिख रहा हो, लेकिन सतह के नीचे तैरती और बढ़ती पस्ती गहराने लगी है। इसका सबसे बड़ा आभास देश में सरकारी ऋण और जीडीपी के बढ़ते अनुपात से मिलता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कहती रही हैं कि देश का ऋण-जीडीपी अनुपात घटाना उनकी मूल प्राथमिकता है। आईएमएफ के अनुसार अभी 2025-26 में भारत का ऋण-जीडीपी अनुपात 80.8% रहेगा। इस ऋण में केंद्र व राज्य सरकार, दोनों के ऋण शामिल हैं। सवाल उठता है कि सरकार यह ऋण कैसे घटा सकती है? इस समय सरकार के राजस्व का करीब 83% हिस्सा अधिकारियों व कर्मचारियों के वेतन (~28%), पेशन (~15%), मौजूदा ऋण के ब्याज (~25%) और सब्सिडी व डिफेंस (~15%) पर चला जाता है। बाकी बचे 17% में सरकार विकास के कौन-से तीर मार सकती है? इसलिए बजट में सार के बजाय झुनझुना व शोर ही ज्यादा रहा करता है। बजट-पूर्व बैठक में अर्थशास्त्रियों ने सलाह दी है कि ऋण घटाने के लिए सरकार को पूंजीगत व्यय घटा देना चाहिए। लेकिन दो साल से इसी व्यय की बदौलत तो जीडीपी में हवा भरी गई है। यह घट गया तो जीडीपी के गुब्बारे का क्या होगा? अब बुधवार की बुद्धि…
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