प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के तमाम मंत्री-संत्री अमेरिका व इज़राइल द्वारा ईरान पर थोपे गए युद्ध पर कुछ भी साफ नहीं बोल रहे। उनके चंगू-मंगू और भड़वा-टाइप पत्रकार ज़रूर चिल्ला रहे हैं कि सरकार की विदेश नीति देशहित को केंद्र में रहकर चलती है और ईरान का साथ न देना भारत के राष्ट्रीय हित में है। कोई उनसे पूछे कि जो हमला समूची दुनिया के हित में नहीं है, वो भारत के हित में कैसे हो सकता है? फारस की खाड़ी में स्थित होर्मुज़ स्ट्रैट या जल डमरू मध्य वैश्विक अर्थव्यवस्था की एक प्रमुख धमनी है जहां से दुनिया की कच्चे तेल व गैस की सप्लाई का लगभग एक चौथाई हिस्सा गुजरता है। इस पर ईरान का कब्जा है और उसने ठान रखी है कि यहां से किसी जलपोत को युद्ध जारी रहने तक पास नहीं होने देगा। ईरान के सैन्य सुरक्षा बलों ने शनिवार को ही साफ कह दिया था कि होर्मुज़ स्ट्रैट को बंद कर दिया गया है। इसके बाद व्यापारिक फर्मो ने वहां से सारी शिपमेंट रोक दीं। सैकड़ों टैंकर खाड़ी के समुद्र में जहां के तहां खड़े कर दिए गए हैं। कच्चे तेल व गैस के दाम बढ़ते जा रहे हैं। युद्ध लम्बा खिंचा तो भारत समेत बहुतेरे देशों में ऊर्जा संकट पैदा हो सकता है। लेकिन चीन में नहीं, क्योंकि ईरान ने चीन के प्रति आभार जताने के लिए केवल उसके टैंकरों को स्ट्रैट से जाने की इजाज़त दे दी है। इसे कहते हैं राष्ट्रीय हितों से जुड़ा राजनय। अब गुरुवार की दशा-दिशा…
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