देश के जीडीपी में 30.1% योगदान वाले एमएसएमई क्षेत्र की हालत साल-दर-साल खराब होती जा रही है। लेकिन सरकार का जुबानी जमाखर्च बदस्तूर जारी है। इस बार बजट के पहले कर्तव्य में चैम्पियन एमएसएमई बनाने का वादा है। इससे पहले 2025-26 के बजट में कृषि के बाद इसे विकास का दूसरा इंजिन बताया गया। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि 2024-25 में इसका बजट आवंटन ₹22,137.95 करोड़ था, संशोधित अनुमान ₹17,306.70 करोड़ का था और वास्तविक खर्च इसका भी आधा मात्र ₹8230.97 करोड़ निकला। 2025-26 में बजट आवंटन ₹23,168.15 करोड़ था, संशोधित अनुमान ₹12,095.15 करोड़ है। 2026-27 के नए बजट में इसका आवंटन ₹24,566.27 करोड़ रखा गया है। लेकिन वास्तविक खर्च का पता दो साल बाद ही चल पाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता संभालते ही इस क्षेत्र को बरबाद करना शुरू कर दिया। पहले 2016 में नोटबंदी से बड़ा हमला। फिर 2017 से जीएसटी का फंदा। यह सब इनफॉर्मल को फॉर्मल बनाने के नाम पर हुआ ताकि छोटे-छोटे उद्योग धंधों का बाज़ार बड़ी देशी-विदेशी कंपनियों को मिल जाए। वैसे, इस मंत्रालय का जिम्मा अब तक कलराज मिश्रा, गिरिराज सिंह, नारायण राणे और जीतनराम मांझी जैसे नमूनों को देकर मोदी सरकार अपनी नीयत बहुत साफ कर चुकी है। अब शुक्रवार का अभ्यास…
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