क्या विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय शेयर बाज़ार से इसलिए भाग रहे हैं क्योंकि डूबते जहाज को छोड़कर सबसे पहले चूहे भागते हैं? क्या भारत वाकई मरी हुई अर्थवयवस्था है? फिर वो सितंबर तिमाही में 8.2% कैसे बढ़ गई? सवाल अनेक हैं। संदेह का कोहरा बहुत घना हो चुका है, दिल्ली के प्रदूषण से भी गहरा। मोटी बात यह है कि विदेशी निवेशक भारत छोड़ इसलिए भागे हैं क्योंकि दिसंबर 2024 से दिसंबर 2025 के बीच अमेरिका केऔरऔर भी

रुपए-डॉलर की विनिमय दर किसी की सदिच्छा या साजिश से नहीं, बल्कि बाज़ार शक्तियों के संतुलन या कहें तो डिमांड-सप्लाई के समीकरण से तय होती है। जिस मुद्रा की मांग ज्यादा, उसका महंगा होना तय है। भारत चूंकि हमेशा आयात ज्यादा और निर्यात कम करता है तो यहां डॉलर की मांग ज्यादा रहती है। इसलिए डॉलर का महंगे होते जाना स्वाभाविक है। हम चीन की तरह नहीं हैं, नवंबर महीने में जिसका व्यापार सरप्लस या अधिशेष एकऔरऔर भी

रिजर्व बैक का कहना है कि वो डॉलर-रुपए की विनिमय दर के बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव या वोलैटिलिटी को रोकने के लिए ही बाज़ार में हस्तक्षेप करता है। लेकिन हकीकत यह है कि रुपए को गिरने से बचाने के लिए रिजर्व बैंक इस साल जनवरी से अक्टूबर तक बाज़ार में शुद्ध रूप से 31.98 अरब डॉलर बेच चुका है। साल 2024 की इसी अवधि में उसने बेचने के बजाय बाज़ार से शुद्ध रूप से 23.03 अरब डॉलर खरीदेऔरऔर भी

बाज़ार में रिजर्व बैंक के डॉलर झोंकने के बावजूद रुपया फिर कमज़ोर होने लगा है। रिजर्व बैंक का हस्तक्षेप रुपए को मजबूत करने का कारगर उपाय नहीं है। वो कुछ समय के लिए गिरने की रफ्तार को थोड़ा थाम सकता है, लेकिन उसकी धार को नहीं रोक सकता। कुछ महीने पहले जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से इस बाबत पूछा गया तो उनका जवाब था: रुपया कमज़ोर नहीं हो रहा, बल्कि डॉलर मजबूत हो रहा है। उनकाऔरऔर भी

रुपया उड़ रहा है या डूब रहा है रसातल में? 16 दिसंबर को जब अमेरिकी डॉलर 91.09 रुपए का हो गया तो हर तरफ हंगामा मच गया। यह रुपए का आज तक सबसे निचला स्तर था। मज़ाक किया जाने लगा कि अंततः अमेरिकी डॉलर की विनियम दर ने उसके आईएसडी कोड़ (+1) को रुपए में भारत के आईएसडी कोड (+91) के बराबर कर दिया। उस दिन मंगलवार था। सरकार ने फौरन रिजर्व बैंक को निर्देश दिया औरऔरऔर भी

जीडीपी के डेटा और उसे निकालने की पद्धति की छीछालेदर जब आईएमएफ और विश्व बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं ही नहीं, देश में सक्रिय तमाम ब्रोकरेज फर्म और निवेश बैंक तक करने लगे, तब केंद्र सरकार में डेटा के शीर्ष पर बैठे मुख्य आर्थिक सलाहकार के कानों पर थोड़ी जूं रेंगने लगी। तय हुआ है कि नए साल 2026 में 12 फरवरी को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) और 27 फरवरी की जीडीपी की नई सीरीज जारी होगी। दोनोंऔरऔर भी

सरकार को तनिक भी शर्म नहीं कि वो देश का डेमोग्राफिक डिविडेंड कहे जानेवाली युवा शक्ति को संभाल नहीं पा रही, उन्हें ढंग का रोज़गार नहीं दे पा रही। नहीं तो इतनी आसानी व मक्कारी से 12 करोड़ गरीब परिवारों से रोज़गार का हक छीनकर उन्हें निरीह याचक नहीं बना देती। उसे फर्क नहीं पड़ता कि देश में 15 से 29 साल के युवाओं में बेरोज़गारी की दर साल-दर-साल लगातार दहाई अंकों में बनी हुई है। यहऔरऔर भी

मनरेगा को खत्म कर लाए गए जी राम जी कानून से जिन 12 करोड़ गरीब परिवारों या प्रति परिवार औसत पांच सदस्य मानें तो 60 करोड़ गरीबों से रोज़गार का हक छीना जा रहा है, यकीनन वे देश के उन 81.35 करोड़ लोगों में शामिल होंगे, जिन्हें सरकार की तरफ से मुफ्त में हर महीने पांच किलो राशन दिया जाता है। अभी तक मनरेगा का लाभ लेनेवाले 60 करोड़ गरीबों का स्वाभिमान बचा हुआ था कि वेऔरऔर भी

अभी राष्ट्रीय खातों की विसंगतियों और जीडीपी के आंकड़ों पर छाया संदेह का कोहरा छंटा भी नहीं था कि भारत सरकार ने मनरेगा को वापस लेकर जी राम जी का ऐसा बिल संसद से पास करा लिया जिसने एक झटके में देश के 12 करोड़ गरीब परिवारों से साल में 100 दिन सरकार से रोज़गार पाने का अधिकार छीन लिया। मुंह में राम, बगल में छूरी की कहावत को सच करते हुए कहने को नए विधेयक मेंऔरऔर भी

ढोल को कितनी भी ज़ोर से पीटा जाए, एक न एक दिन उसकी पोल खुल ही जाती है। मोदी सरकार ने देश के राष्ट्रीय खातों का जो हाल किया है, उसकी पोल अब आईएमएफ जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था ने खोल दी है। सवाल पूछे जाने लगे हैं कि मुद्रास्फीति से लेकर जीडीपी तक के आंकड़े ज़मीनी हकीकत से मेल क्यों नहीं खाते? जब देश की लगभग 90% अर्थव्यवस्था अनौपचारिक या असंगठित क्षेत्र में है, तब 10% संगठित क्षेत्रऔरऔर भी