बाज़ार बंद होने के बाद आंकड़े आए कि अप्रैल में रिटेल मुद्रास्फीति चार महीनों के न्यूनतम स्तर 4.7% पर आ गई। लेकिन मार्च में देश का औद्योगिक उत्पादन बढ़ने की रफ्तार सुस्त पड़कर 2.1% हो गई। कल के बारे में कहा जा रहा है कि चूंकि भूमि अधिग्रहण और जीएसटी जैसे विधेयक फिलहाल टल गए हैं, इसलिए बाज़ार इतना ज्यादा गिर गया। फिर, बाहर से ग्रीस का संकट भी मंडरा रहा है। अब चलाएं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

खरीदारी ज्यादा तो बाज़ार बढ़ता है और बिकवाली ज्यादा तो बाज़ार गिरता है। खरीदारी, बिकवाली का ज्यादा होना बाज़ार में सक्रिय निवेशकों या ट्रेडरों, खासकर संस्थाओं के भावी आकलन व रुख से तय होता है। बाज़ार लगातार दूसरे दिन बढ़ गया तो दूर की कौड़ी फेंकी जाने लगी कि चूंकि चीन ने ब्याज दर घटा दी है, इसलिए रिजर्व बैंक 2 जून को अगली मौद्रिक नीति समीक्षा में ब्याज दर घटा सकता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

बराबर तनाव से दूर रहे। भावनाओं पर अंकुश रखा। किसी के कहने में नहीं आए। खुद सारी गणना की, हिसाब-किताब लगाया। फिर भी सौदा जैसा सोचा था, उसकी उल्टी दिशा में चला गया। ऐसा होने पर अपनी किस्मत को दोष मत दीजिए क्योंकि हर किसी के साथ यही सब होता है। बाज़ार या भविष्य कभी किसी के इशारों पर नहीं चलता। इसीलिए यहां रिस्क को संभालने की रणनीति अपनाई जाती है। अब देखते हैं सोम का व्योम…औरऔर भी

बराबर रिटर्न कमाते-कमाते अक्सर भ्रम हो जाता है कि शेयर बाज़ार में रिस्क ही नहीं। अगर है तो हम उस्ताद जो ठहरे! इस भ्रम को तोड़ दिया बीते हफ्ते बुधवार ने, जब सेंसेक्स 2.63% और निफ्टी 2.74% लुढ़क गया, वो भी सिंगापुर में हुई अल्गोरिदम ट्रेडिंग के चलते। याद रखें कि ग्लोबल हो जाने से शेयर बाज़ार में निवेश/ट्रेडिंग का रिस्क घटने के बजाय बढ़ गया है। आज तथास्तु में ऐसी कंपनी जिसमें रिस्क थोड़ा ज्यादा है…औरऔर भी

भावनाएं किसी को भी दीवाना बना देती हैं। लेकिन दीवानगी किस्से-कहानियों में चलती है, दुनियादारी में नहीं। खासकर, वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में तो कतई नहीं। यहां सफलता का सूत्र है कि ट्रेड में भावनाओं को कभी भी एंट्री न लेने दें। अन्यथा वह आपका सारा बना-बनाया खेल बिगाड़ देगी। यहां जो भी भावनाओं में बहते हैं, वे शिकार बनते हैं और उनका शिकार वे करते हैं जो भावनाओं को साधते हैं। अब करें शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बाज़ार पांच माह की तलहटी पर। सेंसेक्स 2.63% तो निफ्टी 2.74% लुढ़क गया। आखिर क्यों? मोदी सरकार से उम्मीद का टूटना और विदेशी निवेशकों पर टैक्स की बात तो अब पुरानी पड़ गई है। कल असल में गिरने का ट्रिगर लगा सिंगापुर में एल्गोरिदम ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म से निफ्टी फ्यूचर्स की बिकवाली से। 9.39 बजे एनएसई में भी 900 करोड़ रुपए से ज्यादा के निफ्टी फ्यूचर्स बेच डाले गए। फिर तो गिरना रुका ही नहीं। अब आगे क्या…औरऔर भी

काश! कुछ पकापकाया मिल जाता! हम हमेशा शॉर्टकट के चक्कर में पड़े रहते हैं। चिपक लेते हैं बिजनेस चैनलों से। लिपे-पुते एंकरों और तथाकथित विशेषज्ञों की सुनते हैं जो परले दर्जे के धंधेबाज़ हैं। किसी अचूक मंत्र की तलाश में हम उनका उगला जहर अमृत समझकर पीते रहते हैं। लेकिन ध्यान रखें; कोई क्या कहता है, यह महत्वपूर्ण नहीं। महत्वपूर्ण यह है कि भाव क्या कहता है, डेटा क्या कहता है। अब चलाते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

चलते-फिरते लोग अक्सर पूछते हैं कि बाज़ार अब किधर जाएगा, बढ़ेगा या गिरेगा? ट्रेडर के लिए न तो इस सवाल का कोई मतलब है, न ही इसके जवाब का। बाज़ार बढ़े या गिरे, उसे तो कमाने की जुगत चाहिए। बढ़े तो लॉन्ग, गिरे तो शॉर्ट से। उसका मतलब इससे ज़रूर होता है कि सूचकांक या कोई स्टॉक कितना घट-बढ़ सकता है क्योंकि इसके आधार वो मुनाफे की रणनीति बना सकता है। अब पकड़ते हैं मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

जब भी आप किसी भी वजह से तनाव में हों तो उस दौरान ट्रेडिंग कतई नहीं करनी चाहिए। एकदम तनावमुक्त रहें, तभी वाजिब फैसले ले सकते हैं। गणना गलत निकल जाए तो स्टॉप-लॉस से उसे संभाल सकते हैं। लेकिन तनाव में रहे तो अपनी सीमा नहीं समझ में आएगी। कुछ जानकार कहते हैं कि ट्रेडिंग में मजा आए तभी उसे करना चाहिए। अन्यथा बराबर तनाव के चलते आप गलत फैसले ले सकते हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

लुभावने बहकावे में न आएं तो शेयर बाज़ार से कमाना कोई रॉकेट साइंस नहीं। ट्रेडिंग भावनाओं और प्रायिकता को पकड़ने का खेल है जबकि निवेश कंपनी की संभावनाओं को पकड़ने का। जैसे, टीवीएस मोटर को ठीक चार साल पहले हमने 56.35 पर पकड़ा था। अभी चार गुना होकर 235.65 पर है। दिक्कत यह है कि यहां कुछ लोग दूसरों को चरका पढ़ाने का धंधा करते हैं। खैर, सेबी उनकी धरपकड़ में लगी है। अब आज का तथास्तु…औरऔर भी