उपभोक्ता की तेल, साबुन व पेस्ट जैसी रोजमर्रा की ज़रूरतें हमेशा बनी रहनी हैं तो एफएमसीजी कंपनियों का धंधा कभी मंदा नहीं पड़ता। गरीब से गरीब इंसान भी दवाओं व इलाज पर खर्च में कोताही नहीं बरतता तो दवा कंपनियों का धंधा भी सदाबहार चलता है। इसी तरह उन कंपनियों का धंधा भी बराबर चौकस रहता है जो आम उपभोक्ता को नहीं, बल्कि उद्योगों को सीधे अपना माल बेचती हैं। तथास्तु में आज ऐसी ही एक कंपनी…औरऔर भी

ब्रोकरों के धंधे का मुख्य आधार हमारे निवेश या ट्रेडिंग से मिले ब्रोकरेज़ से कमाई करना है। वे अगर मुफ्त सलाह देते हैं तो उनका मकसद हमारा फायदा नहीं, बल्कि हमें सौदे करने के लिए उकसाना होता है। इसलिए उनकी सलाह पर आंख मूंदकर सौदे करना अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा है। बेहतर यही है कि हम खुद अपने नियम व सिस्टम विकसित करें और उसके आधार पर सौदे करें। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

दुनिया में कोई ट्रेडिंग रणनीति नहीं जो हर हाल में कामयाब हो। अच्छी से अच्छी रणनीति भी कुल मिलाकर 60% सफल और 40% विफल होती है। इसलिए माहौल को देखकर रणनीति को बदलते रहना होता है। फिलहाल निराशा का घटाटोप छा रहा है तो लांग के बजाय शॉर्ट करने की नीति सही रहेगी। लेकिन शॉर्ट सौदे आसान नहीं है क्योंकि इन्हें एफ एंड ओ सेगमेंट में ही किया जा सकता है। अब पकड़ते हैं गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

रिजर्व बैंक ने ब्याज दर में अपेक्षित कटौती कर दी। फिर भी शेयर बाज़ार चहकने के बजाय लुढ़क गया। निफ्टी 2.34% और सेंसेक्स 2.37% गिर गया। कारण बताया जा रहा है कि रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष के आर्थिक विकास का अनुमान 7.8% से घटाकर 7.6% कर दिया है। दूसरे, मौसम विभाग का बयान आया कि मानसून इस बार औसत का 93% नहीं, बल्कि 88% रह सकता है। आशा पर निराशा भारी। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

सनफार्मा के नतीजों पर रैनबैक्सी के विलय का बोझ पड़ना ही था तो नतीजों में कमज़ोरी स्वाभाविक थी। ऐसे में ट्रेडरों व निवेशकों में दो तरह की सोच चली। एक, कंपनी दो-तीन तिमाहियों बाद तेज़ी से बढ़ेगी। दूसरी यह कि विलय उस पर भारी पड़ेगा। दूसरी सोच बाज़ार में हावी हो गई तो उसका शेयर छह सालों की सबसे ज्यादा गिरावट का शिकार हो गया। यहीं पर स्टॉप-लॉस का अनुशासन काम आता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

बहुत ही कम होता है कि विदेशी और देशी संस्थाएं एक ही दिशा में सौदे करें। अमूमन विदेशी बेचते हैं तो देशी खरीदते हैं और विदेशी खरीदते हैं तो देशी बेचते हैं। दोनों महारथी! फिर आखिर सही कौन? यकीनन बाज़ार की दिशा विदेशी संस्थाएं तय करती हैं। लेकिन गिरने पर खरीद और उठने पर बिक्री से मुनाफा कमाने का काम देशी संस्थाएं करती हैं, खासकर एलआईसी। म्यूचुअल फंड तो फिसड्डी हैं। अब परखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

जब आप वित्तीय बाज़ार में उतरते हैं तो कल्पना कीजिए कि आप किन शक्तियों के बीच खुद को डाल रहे हैं। लाखों लोग देश के, विदेश के। बैंकों के, पेंशन फंडों, म्यूचुअल फंडों व बीमा कंपनियों के, ब्रोकरेज़ हाउसों के। ऊपर से बहुत सारे प्रोफेशनल ट्रेडर/निवेशक जिनकी आजीविका इसी से चलती है। इन सबके बीच व्यक्तियों के नहीं, बल्कि सामूहिक विवेक से तय होता है किसी सूचकांक या स्टॉक का स्तर। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

ट्रेडर के तनाव से बचने का एक रास्ता यह है कि वो इंट्रा-डे ट्रेडिंग छोड़ दे। इससे बार-बार उसे बाज़ार और स्टॉक के भावों को देखने की ज़रूरत नहीं होगी। इसलिए उसे स्विंग, मोमेंटम या पोजिशनल ट्रेड का ही सहारा लेना चाहिए। साथ ही बार-बार कंप्यूटर या मोबाइल पर भाव देखने की आदत छोड़ देनी चाहिए। तनाव से बचने का दूसरा तरीका यह है कि स्टॉप-लॉस लगाकर दिन में सुबह-शाम ही भाव देखें। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

बाज़ार में बहुत कुछ ऐसा है जो हमारे वश में नहीं। यहां लोगों का चकरघिन्नी बन जाना सहज है। बाज़ार की चाल के आगे सभी अक्सर खुद को बड़ा असहाय महसूस करते हैं, बशर्ते प्रवर्तकों से जुड़े इनसाइडर ट्रेडर या किसी देशी-विदेशी निवेशक संस्था का हिस्सा न हों। इसलिए स्वतंत्र व व्यक्तिगत ट्रेडर बड़े तनाव में रहते हैं। तनाव में बुद्धि नहीं काम करती तो सफल नहीं होते। क्या है बचने का रास्ता? फिलहाल बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

दुनिया के बाज़ार आपस में जुड़ चुके हैं तो पैमाने भी अब ग्लोबल हो गए हैं। अगर मोदी सरकार के एक साल की बात करें तो इस दौरान सेंसेक्स 11.84% और निफ्टी 13.74% बढ़ा है। लेकिन डॉलर के लिहाज से इस बीच एमएससीआई इंडिया सूचकांक मात्र 5.7% बढ़ा है, जबकि चीन का बाज़ार 35.56%, जापान 17.73% व अमेरिका 12.58% बढ़ा है। विदेशी निवेशकों के निकलने की एक वजह यह भी हो सकती है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी