किसी भी देश का बनना-बिगड़ना उसके प्राकृतिक व मानव संसंधनों के कुशल नियोजन पर निर्भर करता है। यही राष्ट्र-निर्माण का बुनियादी आधार है। भारत के पास तो पांच हज़ार पुरानी सभ्यता की समृद्ध विरासत भी है। लेकिन जिस तरह मोदी सरकार बारह सालों से देश के प्राकृतिक संसाधनों को अडाणी व अम्बानी जैसे चंद यारों के हवाले करती जा रही है और उसने 81.35 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन, दस करोड़ किसानों को सरकारी अनुदान, 11 करोड़औरऔर भी

कोई भी जीत या हार अकारण नहीं होती। अमेरिका और चीन आज अगर एआई में इतने आगे निकल गए हैं तो उसकी ठोस वजह है। भारत अगर प्रतिभाओं का विपुल भंडार रखने के बावजूद इतना पीछे छूट गया है तो इसकी व्यक्तिगत नहीं, सरकारी वजह है। अमेरिका में डार्पा (डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट एजेंसी) व नेशनल साइंस फाउंडेशन के साथ ही सिलकॉन वैली के वेंचर कैपिटल फंडों ने दशकों से एआई रिसर्च पर अरबों डॉलर झोंके हैं।औरऔर भी

घोषणा करने में मोदी सरकार को भारत क्या, दुनिया में कोई मात नहीं दे सकता। लेकिन घोषणाओं को ज़मीन पर उतारने में वो इतनी फिसड्डी है कि उसकी कहीं कोई मिसाल नहीं मिलती। हमारे केंद्रीय मंत्रिमंडल ने करीब दो साल पहले 7 मार्च 2024 को इंडिया एआई मिशन की घोषणा की और इसके लिए 10,300 करोड़ रुपए से ज्यादी की रकम आवंटित कर दी। कंप्यूटिंग क्षमता, इनोवेशन सेंटर, डेटासेट प्लेटफॉर्म, एप्प डेवपलमेंट इनिशिएटिव, फ्यूचर स्किल्स और स्टार्ट-अपऔरऔर भी

नए साल के बजट पर विचार करने से पहले पता लगाना ज़रूरी है कि आखिर बजट में घोषणा के बाद चालू वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान शिक्षा व शोध में अब तक हमारी क्या उपलब्धि रही है? बजट में दावा किया गया था कि शिक्षा पर ₹1,28,650 करोड़ आवंटित किए जा रहे है। हकीकत में यह 2024-25 के बजट आवंटन ₹1,25,638 करोड़ से मात्र 2.40% ज्यादा था और कुल ₹50,65,345 करोड़ के बजट का 2.54% ही था।औरऔर भी

यह महज संयोग है, प्रयोग है या चंद उद्योगपतियों के हितों व विज़न को 146 करोड़ भारतवासियों के हितों व ज़रूरत का पर्याय बना देना। जिस दिन गौतम अडाणी ने बारामती में शरद पवार की मौजूदगी में खुद अपने समूह द्वारा वित्तपोषित एआई सेंटर ऑफ एक्सेलेंस का उद्घाटन किया, ठीक उसके अगले ही दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में अर्थशास्त्रियों के साथ बजट-पूर्व बैठक की, जिसमें एआई में उत्कृष्टता केंद्र बनाने का सुझाव सबसे प्रमुखता सेऔरऔर भी

क्या विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय शेयर बाज़ार से इसलिए भाग रहे हैं क्योंकि डूबते जहाज को छोड़कर सबसे पहले चूहे भागते हैं? क्या भारत वाकई मरी हुई अर्थवयवस्था है? फिर वो सितंबर तिमाही में 8.2% कैसे बढ़ गई? सवाल अनेक हैं। संदेह का कोहरा बहुत घना हो चुका है, दिल्ली के प्रदूषण से भी गहरा। मोटी बात यह है कि विदेशी निवेशक भारत छोड़ इसलिए भागे हैं क्योंकि दिसंबर 2024 से दिसंबर 2025 के बीच अमेरिका केऔरऔर भी

रुपए-डॉलर की विनिमय दर किसी की सदिच्छा या साजिश से नहीं, बल्कि बाज़ार शक्तियों के संतुलन या कहें तो डिमांड-सप्लाई के समीकरण से तय होती है। जिस मुद्रा की मांग ज्यादा, उसका महंगा होना तय है। भारत चूंकि हमेशा आयात ज्यादा और निर्यात कम करता है तो यहां डॉलर की मांग ज्यादा रहती है। इसलिए डॉलर का महंगे होते जाना स्वाभाविक है। हम चीन की तरह नहीं हैं, नवंबर महीने में जिसका व्यापार सरप्लस या अधिशेष एकऔरऔर भी

रिजर्व बैक का कहना है कि वो डॉलर-रुपए की विनिमय दर के बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव या वोलैटिलिटी को रोकने के लिए ही बाज़ार में हस्तक्षेप करता है। लेकिन हकीकत यह है कि रुपए को गिरने से बचाने के लिए रिजर्व बैंक इस साल जनवरी से अक्टूबर तक बाज़ार में शुद्ध रूप से 31.98 अरब डॉलर बेच चुका है। साल 2024 की इसी अवधि में उसने बेचने के बजाय बाज़ार से शुद्ध रूप से 23.03 अरब डॉलर खरीदेऔरऔर भी

बाज़ार में रिजर्व बैंक के डॉलर झोंकने के बावजूद रुपया फिर कमज़ोर होने लगा है। रिजर्व बैंक का हस्तक्षेप रुपए को मजबूत करने का कारगर उपाय नहीं है। वो कुछ समय के लिए गिरने की रफ्तार को थोड़ा थाम सकता है, लेकिन उसकी धार को नहीं रोक सकता। कुछ महीने पहले जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से इस बाबत पूछा गया तो उनका जवाब था: रुपया कमज़ोर नहीं हो रहा, बल्कि डॉलर मजबूत हो रहा है। उनकाऔरऔर भी

रुपया उड़ रहा है या डूब रहा है रसातल में? 16 दिसंबर को जब अमेरिकी डॉलर 91.09 रुपए का हो गया तो हर तरफ हंगामा मच गया। यह रुपए का आज तक सबसे निचला स्तर था। मज़ाक किया जाने लगा कि अंततः अमेरिकी डॉलर की विनियम दर ने उसके आईएसडी कोड़ (+1) को रुपए में भारत के आईएसडी कोड (+91) के बराबर कर दिया। उस दिन मंगलवार था। सरकार ने फौरन रिजर्व बैंक को निर्देश दिया औरऔरऔर भी