शेयर बाज़ार को लेकर हमारे रिटेल निवेशकों में इस समय उन्माद-सा छाया हुआ है। कोरोना से ग्रसित दुनिया के शीर्ष 12 देशों में केवल भारत में नए मामले आते जा रहे हैं। हम फिलहाल चौथे नंबर पर हैं। जल्दी ही रूस और ब्राज़ील को पीछे छोड़कर अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर आ सकते हैं। फिर भी शेयर बाज़ार में सक्रिय रिटेल निवेशकों की संख्या साल 2007 जैसी ऊंचाई पर पहुंच गई है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

म्यूचुअल फंडों में आम निवेशकों का ही धन लगा है। जो लोग सीधे शेयर बाज़ार में निवेश करने के झंझट/रिस्क से बचना चाहते हैं, वे म्यूचुअल फंडों का रास्ता अपनाते हैं। इसलिए म्यूचुअल फंडों को कम से कम जोखिम उठाना चाहिए। लेकिन हमारे फंड भी गजब हैं! कोरोना संकट में, जब विदेशी निवेशक भाग रहे थे, तब इन फंडों ने लिस्टेड कंपनियों में अपना निवेश बढ़ाकर 7.97% के सर्वोच्च स्तर तक पहुंचा दिया। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

दस दिन पहले तक लग रहा था कि कोरोना की महामारी और अर्थव्यवस्था की डूबती नब्ज अपने साथ शेयर बाज़ार को डुबा ले जाएगी। लेकिन अब तो शेयर बाजार फिर से बम-बम करने लगा है। एक तरफ अर्थव्यवस्था ऐतिहासिक तलहटी पर पहुचती दिख रही है, दूसरी तरफ शेयर बाज़ार ऐतिहासिक चोटी से महज 20% दूर है। मगर याद रहे कि यह किसी आशा नहीं, बल्कि मुनाफा खोजने निकले मुक्त धन का प्रताप है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में वोलैटिलिटी बहुत ज्यादा बढ़ गई है। निफ्टी जहां फरवरी में इंट्रा-डे ज्यादातर 80-100 अंकों के दायरे में भटकता था, वहीं अब उसका दायरा 200 अंकों से ज्यादा हो गया है। दायरा दोगुना तो पूंजी डूबने का जोखिम भी दोगुना। कहने में अच्छा लगता है कि पहले जहां किसी चलते शेयर से पांच दिन में 5% कमा पाते, वहीं अब एक दिन में इतना कमा सकते हैं। लेकिन पूंजी डूबी तो? अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

समुद्र में हाई टाइड आता है तो आम लोगों को समुद्र तट से दूर रहने की सलाह दी जाती है। शेयर बाज़ार में हाई टाइड जैसी अवस्था वोलैटिलिटी के ज्यादा बढ़ने पर आती है। वोलैटिलिटी के लिए हिंदी में कोई शब्द है नहीं। चंचलता कहने से इसकी धार हल्की पड़ जाती है। अफरातफरी या घबराहट इसे कह नहीं सकते। सांख्यिकी में इसकी गणना भावों के उतार-चढ़ाव का स्टैंडर्ड डेविएशन निकालकर की जाती है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

बाज़ार में बहुत ज्यादा उछल-कूद मची हो तो उसकी भावी गति का कोई भी अनुमान सही निकलना बेहद मुश्किल होता है। लगाने को आप अनुमान लगा ही सकते हैं, लेकिन अक्सर ये अनुमान गलत निकलते हैं तो मंजे हुए ट्रेडरों को भी तगड़ी मार लगती है। पिछले कुछ महीनों से अपने शेयर बाज़ार में यही चल रहा है। अचानक बढ़ते-बढ़ते बाज़ार लुढ़क जाता है तो गिरते-गिरते आखिरी वक्त पर एकबारगी उछल जाता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अनहोनी के डर व सस्ते धन के प्रवाह के बीच अल्गोरिदम ट्रेडिंग ने भी बाज़ार के उतार-चढ़ाव को बढ़ा रखा है। ग्लोबल हो चुकी फाइनेंस की दुनिया में ऐसा हर तरफ हो रहा है। आप जानकर चौंक जाएंगे कि बीते हफ्ते बुधवार को अमेरिका का नैस्डैक-100 सूचकांक ऐतिहासिक शिखर पर पहुंच गया, लेकिन अगले ही दिन वहां के तमाम सूचकांक ताश के पत्तों की तरह बिखर गए। क्या पता, हालात कब सामान्य होंगे? अब मंगलवार की बुद्धि…औरऔर भी

रिस्क को आप प्रायिकता से संतुलित करने की कोशिश कर सकते हो। लेकिन अनिश्चितता में अंततः बीमा ही काम आती है। उसे किसी और तरीके से मापा या नाथा नहीं जा सकता। इस समय शेयर बाज़ार में ऐसी ही अनिश्चितता छाई है। एकदम नहीं पता कि आगे क्या होनेवाला है। अज्ञात का डर सबके मन में छाया है। लेकिन सस्ते ब्याज पर इफरात धन बहता आ रहा है तो बाज़ार चढ़ रहा है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

कोरोना की महामारी किसी बिजनेस के लिए बुरी है तो किसी के लिए अच्छी। मसलन, मार्च, अप्रैल व मई के कोरोना काल में पारले प्रोडक्ट्स की बिकी आठ दशको में सबसे ज्यादा बढ़ी है। इसमें 80-90% योगदान पारले-जी बिस्किट का है। इस दौरान एफएमसीजी व दवा कंपनियों का भी धंधा बढ़ा है। दूसरी तरफ देश की सबसे बड़ी कार निर्माता मारुति को कोरोना के चलते मई में उत्पादन 98% घटा देना पड़ा है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

प्रतिस्पर्धा, निष्पक्षता, उद्यमशीलता, मांग, सप्लाई व न्याय जैसे मूल्य बाज़ार का अभिन्न हिस्सा माने जाते हैं। लेकिन बाज़ार के साथ सब निष्पक्ष ही नहीं होता। रिलायंस ने कोरोना काल की घनघोर निराशा के बीच भी बाज़ार से जिस तरह से 1.51 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा जुटा लिए हैं, वह कमाल की बात है। लेकिन यह कमाल हासिल करने में सेबी, कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय और वित्त मंत्री तक ने उसकी मदद की है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी