प्राइस डिस्कवरी में शेयर बाज़ार की भूमिका किसी एक कंपनी या उद्यम के बारे में सही हो सकती है। मसलन, रिलायंस ने कोरोना संकट के बावजूद जियो प्लेटफॉर्म के लिए 1.52 लाख करोड़ रुपए जुटा डाले। लेकिन शेयर बाज़ार अर्थव्यवस्था का मूल्य खोजने का साधन नहीं रह गया है। कारण यह है कि बोली लगानेवाला धन अब देशी ही नहीं रहा, बल्कि इसमें कहीं ज्यादा बड़ी भूमिका विदेशी धन की हो गई है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अमेरिका के बारे में कह सकते हैं कि वहां 3 नवंबर को राष्ट्रपति चुनाव होने हैं। वहां सालों-साल का इतिहास रहा है कि राष्ट्रपति चुनाव आने तक शेयर बाज़ार को चढ़ाया जाता है। इसलिए शेयर बाज़ार को ज्यादा भाव मिल रहा है। लेकिन जापान के निक्केई सूचकांक का पी/ई अनुपात क्यों चढ़ा हुआ है? वहीं, चीन का शांघाई सूचकांक दबा हुआ है, जबकि वह कोरोना पर काफी हद तक नियंत्रण कर चुका है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

कहते हैं कि शेयर बाज़ार उद्यमों का मूल्य खोजने या प्राइस डिस्कवरी का माध्यम हैं। अर्थव्यवस्था की अंदरूनी क्षमता भी यह दिखाता है। पर यह वाकई कैसे होता है, यह कतई साफ नहीं। जैसे, अमेरिका का डाउ जोन्स सूचकांक व S&P-500 सूचकांक का पी/ई अनुपात साल भर में बढ़कर क्रमशः 18.60 से 28.26 और 21.92 से 35.39 हो गया, जबकि वहां की आर्थिक स्थिति खराब चल रही है और भविष्य भी डांवाडोल है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

हम रिटेल ट्रेडर हैं। सीमित धन, समझ व संसाधन। मगर असीमित हौसला लेकर बाज़ार में उतरते हैं। यह असीमित हौसला या रिस्क लेना तभी काम आता है, जब हम सच को आधार बनाते हैं। बाज़ार का सच यह है कि यहां शत-प्रतिशत थोक व्यापारी कमाते हैं, जबकि 95% रिटेल ट्रेडर गंवाते हैं। बाकी 5% ट्रेडर इसलिए कमाते हैं क्योंकि थोक व्यापारियो की तरह थोक भाव पर खरीदते और रिटेल भाव पर बेचते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

कहते हैं कि शेयर बाज़ार उद्यमों/कंपनियों की ‘प्राइस डिस्कवरी’ या ‘मूल्य निर्धारण’ का माध्यम है। जाहिर है कि ‘मूल्य निर्धारण’ वही कर सकता है जिसके पास भरपूर धन हो। क्या हम-आप कभी आईपीएल के खिलाड़ियों की बोली लगा सकते हैं? इसलिए शेयर बाज़ार में उतरते वक्त हमें हमेशा अपनी औकात याद रखनी चाहिए। नहीं तो इस नदी में हम मछलियों की तरह किसी न किसी उस्ताद में कांटे में फंस जान गवां बैठेंगे। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

शेयर बाज़ार समेत समूचा वित्तीय बाज़ार फाइनेंस का बाज़ार है। इस बाज़ार का सच यही है कि जिनके पास अपनी ज़रूरत से बहुत-बहुत ज्यादा इफरात धन है, वही यहां के मूल व्यापारी हैं। हमें लगता है कि इसमें धन की नदी बह रही है। मुठ्ठी या बर्तन डालो, जितना चाहो, निकालते जाओ। लेकिन प्यासे पांडवों और यक्ष के तालाब का किस्सा याद करें। प्यास मिटाने से पहले यक्ष प्रश्नों का जवाब देना पड़ेगा। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

मान्यताओं और धारणाओं में फंसकर आप सच तक नहीं पहुंच सकते। लगेगा कि आप अपना भला कर रहे हो, लेकिन दरअसल दूसरे लोग आपके भोलेपन का फायदा उठाकर ऐश करते हैं। जीवन की तरह शेयर बाज़ार में भी यही होता है। धंधेबाज़ आपको तरह-तरह मान्यताओं और धारणाओं में उलझा देते हैं। आप उछाले गए बड़े नामों को आदर्श और उन्हीं की बातों को सच मान बैठते हो। फिर निरंतर घोखा खाते रहते हो। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयरों में दीर्घकालिक निवेश बैक एफडी या प्रॉपर्टी में धन लगाने जैसा काम है। लेकिन शेयर बाज़ार में की गई ट्रेडिंग विशुद्ध बिजनेस है। इस पर टैक्स-निर्धारण भी उसी हिसाब से होता है। निवेश में धन लगाकर हम सालों तक के लिए भूल सकते हैं। लेकिन वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में किसी भी बिजनेस की तरह पल-पल की हलचलों पर ध्यान देना पड़ता है। स्टॉप-लॉस में गया धन इस बिजनेस की लागत है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

शेयरों की ट्रेडिंग से कमाना है तो दूसरे की सलाह नहीं, बल्कि अपने सिस्टम और अनुशासन पर चलें। इसका पहला कारण यह है कि पूंजी आपकी लगी है, दूसरे की नहीं। दूसरा यह कि पल-पल बदलते भावों में आपका सिस्टम और अनुशासन नहीं रहा तो आप कभी भी फिसल जाएंगे। बफेट के दो नियम जानते ही होंगे। पहला, हमेशा अपनी ट्रेडिंग पूंजी बचाकर चलें और दूसरा यह कि पहला नियम बराबर याद रखें। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

शेयर बाज़ार की ‘आसान, सरल व सुलभ’ राह पर चलते-चलते जब अचानक वास्तविक सच्चाई से हमारा वास्ता पड़ता है, तब पता चलता है कि बड़ी मशक्कत से जोड़ी गई बचत कैसे देखते ही देखते एक झटके में स्वाहा हो जाती है। दो-चार हज़ार भी डूब जाएं तो हम घबरा जाते हैं, भयंकर असुरक्षा छा जाती है। लेकिन संस्थाएं रोज़ाना करोड़ों दांव पर लगाती हैं। फिर भी बगैर किसी असुरक्षा के जमकर कमाती हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी