कहने को अपने यहां निवेशक संरक्षण कोष हैं। ये कोष स्टॉक एक्सचेंजों के पास हैं। साथ ही कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय के अधीन अलग से निवेशक शिक्षा व संरक्षण कोष बना हुआ है। मगर सच्चाई यह है कि शेयर बाज़ार का मारा निवेशक सेबी और स्टॉक एक्सचेजों के दरवाजों पर सिर पटकता रह जाता है। यही वजह है कि तीन दशकों से निजी निवेशकों की संख्या आबादी के लगभग 2% पर अटकी पड़ी है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार ऐसी जगह है कि जहां 95% निवेशक/ट्रेडर हंसते हुए आते और रोते हुए निकलते हैं। कारण यह कि वे रिस्क को कायदे से समझे बिना लालच में आकर बाज़ार में कूदते हैं। ऊपर से अपने यहां निवेशकों के संरक्षण की प्रणाली बहुत पुख्ता नहीं है। डीमैट खाता खुलवाते वक्त ही ब्रोकर निवेशकों के हस्तक्षर से उनकी पावर ऑफ अटार्नी ले लेते हैं। फिर ब्रोकरेज़ की खातिर उनके लाखों उड़ा डालते हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी बराबर प्रयासरत है कि ब्रोकरों के ‘अन्याय’ से निवेशकों व ट्रेडरों को बचा लिया जाए। इसी क्रम में वह, कल 1 सितंबर से मार्जिन ट्रेडिंग संबंधी नए नियम लागू कर रही है। अभी तक ब्रोकर निवेशक के 70-80% शेयर अपने पास बतौर मार्जिन रख लेते थे। लेकिन अब शेयर निवेशक के डीमैट खाते में ही रहेंगे और मार्जिन ट्रेडिंग के लिए उन्हें ब्रोकर के पास गिरवी रखना पड़ेगा। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में नई भीड़ तब आई है, जब पिछले 3 साल में जितने व जिस तरह ब्रोकरों ने डिफॉल्ट किया है, वैसा शायद पिछले 15 साल में नहीं हुआ था। कार्वी का किस्सा सबको पता है। पर इसके अलावा रिटेल निवेशकों को भारी चपत लगाने वाले ब्रोकरेज हाउसों में वेल्थ मंत्रा, इंडिया निवेश, फेयरवेल्थ, मोडेक्स, आम्रपाली आद्या, कास्सा फिनवेस्ट, यूनिकॉर्न, वसंती, फाइकस सिक्यू. व एलायड फाइनेंस जैसे नाम शामिल हैं। अब शुक्र का अभ्यास…और भीऔर भी

दीए की लौ पर पतंगों की तरह नए-नए रिटेल ट्रेडर शेयर बाज़ार की तरफ लपके चले आ रहे हैं। तमाम ब्रोकरेज़ हाउस खुश हैं कि नई पीढ़ी के निवेशक ज़ोर-शोर से डीमैट खाते खुलवा रहे हैं। दरअसल, ऑनलाइन ट्रेडिंग, कम ब्रोकरेज़, भांति-भांति के एप्प, धन व स्टॉक्स के आसान ट्रांसफर और कोरोना संकट में घर से काम करने की सहूलियत ने शेयर बाज़ार में खेलने को हाल-फिलहाल फुरसत का धंधा बना दिया है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

साल भर पहले एनएसई में शेयरों में हो रही ट्रेडिंग में रिटेल निवेशकों का हिस्सा 38% हुआ करता था। इधर नए निवेशकों के जुड़ने पर इसमें शायद इजाफा हो गया होगा। मुश्किल यह है कि नए आगंतुक समझदारी या विश्लेषण से मूल्य की तलाश में निकले दीर्घकालिक निवेशक नहीं, बल्कि डे-ट्रेडिंग, मार्जिन ट्रेडिंग और फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस में खेलनेवाले 25-30 या 35 साल तक के लोग हैं जिन्हें गेमिंग मे मज़ा आता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

रिजर्व बैंक गर्वनर के बयान से महीने भर पहले पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी के चेयरमैन अजय त्यागी ने एक सम्मेलन में बताया था कि देश में नए डीमैट खातों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। लॉकडाउन के बाद दस लाख से ज्यादा डीमैट खाते खुले हैं और ये सभी आईपीओ या नई लिस्ट होनेवाली कंपनियों में नहीं, बल्कि शेयर बाज़ार में पहले से लिस्ट कंपनियों में निवेश/ट्रेडिंग करने को आतुर हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार पर भले ही सेबी का नियमन चले, वो स्टॉक एक्सचेंजों के नियमों के अधीन काम करे, लेकिन उसकी चाल पर न तो सरकार का कोई नियंत्रण है और न ही रिजर्व बैंक का। रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास तक मानते हैं कि शेयर बाज़ार की तेज़ी और अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति में कोई रिश्ता नहीं। भारत ही नहीं, दुनिया भर में अतिरिक्त धन का प्रवाह बाज़ार को चढ़ाए हुए है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

वित्तीय पूंजी की घातक फांस से दुनिया को निकालना ज़रूरी है। भारत चाहे तो इस दिशा में सार्थक पहल कर सकता है। वह अनुत्पादक वित्तीय पूंजी के जाल को काट उत्पादक पूंजी व उत्पादन के साधनों को बढ़ावा दे सकता है। मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को बढ़ाकर रोजगार के नए अवसर पैदा कर सकता है। लेकिन दिक्कत यह है कि मौजूदा सरकार ने हमारी बचत पर झपट्टा मारकर हमें खोखले नारों में उलझा रखा है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

यह उधार की दुनिया है। बेहद सस्ता उधार लेकर ग्लोबल पूंजी मुनाफे के माध्मय तलाशती हर तरफ सूंघती फिर रही है। व्यापार और पूंजी के प्रवाह में असंतुलन आ गया है। अर्थव्यवस्था का वित्तीयकरण हो चुका है। कोई सवाल नहीं उठते क्योंकि इससे सम्पन्नता व समृद्धि आ रही है। लेकिन वित्तीय पूंजी का यह दबदबा कितना घातक है, यह 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट दिखा चुका है। तभी से लीपापोती चल रही है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी