हमारे शेयर बाजार में तात्कालिक सुधार की सबसे बड़ी चुनौती है इक्विटी डेरिवेटिव्स के उन्माद को थामकर कैश बाज़ार को ज्यादा गहरा व व्यापक बनाना क्योंकि वही पूंजी-निर्माण और मूल्य-खोज का असली साधन है। डेरिवेटिव्स तो केवल बड़े संस्थागत निवेशकों के लिए रिस्क को संभालने और हेजिंग का ज़रिया भर हैं। वो तो असल में रिटेल ट्रेडरों व निवेशकों के लिए वर्जित क्षेत्र होना चाहिए। यकीनन, भारतीय शेयर बाज़ार का जाल काफी फैल चुका है। देश के कुल 19101 पिन कोड में से बमुश्किल 30 पिन कोड बचे होंगे। बाकी सभी जगहों तक शेयर बाज़ार निवेशकों के ज़रिए पहुंच चुका है। हर साल और महीने इनकी संख्या बराबर बढ़ रही है। बीएसई के मुताबिक देश में इस समय पंजीकृत निवेशकों की संख्या 22.23 करोड़ के पार जा चुकी है। लेकिन इतने विस्तार के बावजूद शेयर बाज़ार का कैश सेगमेंट बहुत उथला है, इसमें गहराई नहीं है। सेबी के पूर्णकालिक निदेशक अनंत नारायण ने पिछले हफ्ते कोलकाता में सीआईआई के सम्मेलन में कहा, “डेरिवेटिव बाज़ार में उत्पादों की मीयाद और मेच्योरिटी बढ़ाकर क्वालिटी सुधारने का विचार है। हमें कैश बाज़ार को और गहरा करने के तरीकों पर भी गौर करना होगा।” दिक्कत यह है कि डेरिवेटिव बाजार तो बढ़ता जा रहा है, मगर कैश बाज़ार घिसा-पिटा अंदाज़ तोड़ नहीं पा रहा। आखिर क्यों? अब शुक्रवार का अभ्यास…
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