कंपनियों को मिली 15% टैक्स देकर काले को सफेद करने की सहूलियत!

बजट एक ऐसी बला है, शोर थमने के बाद भी जिसका सार सामने नहीं आता। खासकर, फाइनेंस बिल इतना उलझा हुआ होता है कि पहुंचा हुआ वकील ही मसला सुलझा सकता है। ऐसे ही वकील, मुंबई की मशहूर लॉ फर्म डीएम हरीश एंड कंपनी के पार्टनर अनिल हरीश बताते हैं कि इस बार के बजट में पी चिदंबरम ने भारतीय कंपनियों को विदेशी कंपनियों के सहारे मात्र 15 फीसदी टैक्स देकर अपनी काली कमाई सफेद करने का मौका दे दिया है। यह मौका केवल साल भर के लिए मिल रहा है।

आगे बढ़ने के पहले बता दें कि आयकर कानून 1961 में मार्च 2012 तक 816 संशोधन हो चुके हैं। इस बार के भी संशोधनों को मिलाकर यह संख्या 850 से ऊपर पहुंच जाएगी। इसी से आयकर कानून की दुरूहता को समझा जा सकता है और महसूस किया जा सकता है कि आयकर अफसर कितने सारे नुक्ते लगाकर आपको सालोंसाल तक फंसाए रख सकता है। यह जटिलता विभाग में छाए भ्रष्टाचार की भी बड़ी अम्मा है।

खैर, अनिल हरीश के मुताबिक फाइनेंस बिल 2013 में आयकर कानून के सेक्शन 115 बीबीडी के जरिए तय किया गया है कि अगर कोई कंपनी किसी ऐसी विदेशी कंपनी से, जिसमें उसकी शेयरधारिता 26 फीसदी या इससे ज्यादा है, लाभांश हासिल करती है तो उसे महज 15 फीसदी टैक्स देना पड़ेगा। उसे इस पर किसी तरह का डिविडेंट डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स (डीडीटी) या इनकम टैक्स नहीं देना पड़ेगा। श्री हरीश का कहना है कि इससे कोई कंपनी अपना ही धन बाहर भेजकर लाभांश के रूप में वापस लाकर काले से सफेद कर सकती है, वो भी मात्र 15 फीसदी टैक्स देकर। बाहर से लाये गए दस करोड़ रुपए पर वह 1.50 करोड़ रुपए टैक्स देकर मुक्त हो जाएगी, जबकि देश के भीतर इतनी ही आमदनी घोषित करने पर उसे 3.39 करोड़ रुपए टैक्स देना पड़ेगा।

अभी तक भारतीय कंपनियों को अपनी घरेलू सब्सिडियरी कंपनियों से मिले लाभांश पर डीडीटी नहीं देना पड़ता था। चिदंबरम ने सेक्शन 115-ओ में संशोधन करते हुए यह रियायत अब भारतीय कंपनियों की विदेशी सब्सिडियरी इकाइयों को भी दे दी है। वित्त मंत्री पी चिदंबरम दावा करते हैं कि उन्होंने विदेशी निवेशकों या रेटिंग एजेंसियों को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि भारतीय अवाम को ध्यान में रखकर बजट बनाया है। लेकिन बजट के तमाम प्रावधान, टैक्स व सरचार्ज की दरें कुछ और ही हकीकत बयान करती हैं।

एडवोकेट अनिल हरीश ने शनिवार को मनीलाइफ फाउंडेशन की तरफ से आयोजित एक संगोष्ठी में तमाम ऐसी जानकारियां दीं। उन्होंने बताया कि बजट में कई ऐसे प्रावधान हैं जिन्हें देखकर लगता है कि वे किन्हीं खास व्यक्तियों को लाभ पहुंचाने के लिए लाए गए हैं। जैसे, वित्त मंत्री ने कहा कि वे सूक्ष्म और छोटे उद्योगों (एमएसएमई) को बढ़ावा दे रहे हैं। लेकिन 15 फीसदी निवेश भत्ता उन्हीं कंपनियों को दिया जाएगा जो 100 करोड़ रुपए से ज्यादा का निवेश नए 1 अप्रैल 2014 से 31 मार्च 2015 के दौरान प्लांट व मशीनरी में करेंगी। सवाल उठता है कि जो कंपनी 100 करोड़ रुपए का निवेश कर सकती है, वह एमएसएमई तो कतई नहीं हो सकती।

दूसरे, बजट के मुताबिक ऐसी कंपनी अगले दो सालों में कोई भी वस्तु या चीज़ (article or thing) बना (मैन्यूफैक्चर) सकती है। श्री हरीश कहते हैं कि यह प्रावधान जानबूझकर अस्पष्ट रखा गया है। बिल्डर भी कह सकते हैं कि उन्होंने इमारत बनाकर कोई वस्तु या चीज़ बनाई है और इसके आधार पर 15 फीसदी निवेश भत्ता हासिल कर सकते हैं। चिदंबरंम खुद वकील हें और चाहते तो प्रावधान में स्पष्ट कर सकते थे कि इसका लाभ रीयल एस्सेट को नहीं मिलेगा। अब अगर रीयल एस्टेट सेक्टर को इसका लाभ नहीं मिलेगा, वह मुकदमा तो कर ही सकता है। रीयल एस्टेट के विशेषज्ञ अनिल हरीश का आरोप है, “लगता है कि किसी कंपनी या फर्म ने अपने रसूख का इस्तेमाल करके बजट में यह प्रावधान डलवाया है।”

श्री हरीश का कहना है कि वित्त मंत्री ने बजट 2013-14 में कई मसलों को पूरी तरह नज़रअंदाज किया है। जरूरत थी कि काले धन, भ्रष्टाचार, घोटालों, विदेशी खातों, विदेशी मुद्रा विनिमय दर, महंगाई और रोज़गार के अवसरों पर ध्यान दिया जाता। लेकिन चिदंबरम ने इन पर रत्ती भर भी ध्यान नहीं दिया। खैर, अच्छी बात यह है कि उन्होंने एस्टेट ड्यूटी नहीं लगाई। उत्तराधिकार पर इस तरह का टैक्स लगने से बहुतों की मुसीबत बढ़ जाती।

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