चीन पर बढ़ती निर्भरता सुनियोजित लगती है। नवंबर 2016 में नोटबंदी से हमारे एमएसएमई क्षेत्र की कमर तोड़ दी गई। जुलाई 2017 में जीएसटी आया तो छोटी व मध्यम औद्योगिक इकाइयों पर दूसरा सरकारी हमला हुआ। फिर मार्च 2020 में कोरोना महामारी में गलत लॉकडाउन के फैसले ने हज़ारों लघु इकाइयों पर ताला लगवा दिया। यह सब करते हुए सरकार मगन थी कि वह अर्थव्यवस्था का इनफॉर्मल स्वरूप खत्म कर उसे फॉर्मल बना रही है, सारी औद्योगिक गतिविधियों को असंगठित क्षेत्र से संगठित क्षेत्र में ला रही है। बडा कॉरपोरेट क्षेत्र भी तालियां बजा रहा था कि उसे असंगठित क्षेत्र में बिखरा बाज़ार एकमुश्त मिल जाएगा। लेकिन छोटे व लघु उद्योगों के बंद होते जाने से करोड़ों लोग बेरोज़गार हो गए। अर्थव्यवस्था में खपत घटती चली गई। कॉरपोरेट क्षेत्र को मांग न होने से नया निवेश में कोई फायदा नहीं दिखा। तमाम उद्योग-धंधों को देश में माल बनाने के बजाय चीन से आयात कर अपना ठप्पा लगा देना ज्यादा लाभप्रद लगा। उधर, मौके का फायदा उठाकर चीनी कंपनियां और माल देश में घुसते चले गए। उन्होंने हमारे मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को आज इतना पंगु बना दिया है कि अब उसका उठ पाना मुश्किल है। यह सब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देखरेख और स्वदेशी व आत्मनिर्भर भारत के नारों के शोर के बीच बड़ी शांति से होता चला गया। अब शुक्रवार का अभ्यास…
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