देश में 1991 के आर्थिक उदारवाद की शुरुआत के तीन-चार साल बाद ही कुछ जन-पक्षधर अर्थशास्त्रियों ने कहा था कि जीडीपी की गणना में कितने भी डिफ्लेटर शामिल कर लिए जाएं और मुद्रास्फीति के प्रभाव को खत्म कर लिया जाए, लेकिन चूंकि वो उत्पादन पर ही ज्यादा फोकस करता है, इसलिए अर्थव्यवस्था की सही तस्वीर नहीं पेश करता। उनका कहना था कि जीडीपी की गणना में उत्पादन और मुद्रास्फीति जितना ही महत्व बेरोज़गारी की स्थिति को दिया जाना चाहिए। असल में अमेरिका, यूरोप व जापान जैसे दुनिया के तमाम विकसित जीडीपी की गंणना से लेकर आर्थिक व मौद्रिक नीतियों के निर्धारण में बेरोज़गारी के अद्यतन डेटा को पूरा महत्व देते हैं। अमेरिका में तो हर महीने की 5 तारीख से पहले ठीक पिछले में रोज़गार व बेरोज़गारी का संपूर्ण डेटा सरकार का श्रम ब्यूरो सार्वजनिक रूप से अपनी वेबसाइट पर जारी कर देता है। लेकिन अपने यहां न तो अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह और न ही एनटायर पॉलिटिकल साइंस के स्वघोषित डिग्रीधारी नरेंद्र मोदी की सरकार ने बेरोज़गारी के डेटा को बराबर अपडेट करने और उसे जीडीपी की गणना में शामिल करने की ज़रूरत समझी। 12 फरवरी को मुद्रास्फीति को नया आधार दे दिया गया और 27 फरवरी को जीडीपी को। औद्योगिक मूल्य सूचकांक मई से नया हो जाएगा। मगर रोज़गार नहीं। अब बुधवार की बुद्धि…
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