बाजार में ऐसा बहुत कुछ अजब-गजब चलता रहता है जिस पर हम ध्यान नहीं देते, जबकि ध्यान देते रहना चाहिए। हालांकि ध्यान देने का असली काम तो स्टॉक एक्सचेंजों और सेबी का है। वे ध्यान देंगे, तभी हालात सुधर सकते हैं। हम तो ध्यान देकर बस ‘विचित्र, किंतु सत्य’ का आनंद ही ले सकते हैं। जैसे, कल बीएसई में एनसीसी लिमिटेड (कोड – 500294) के 8.02 लाख शेयरों का कारोबार हुआ, लेकिन आप यकीन नहीं करेंगे कि इसमें से मात्र 17,871 यानी 2.23 फीसदी ही डिलीवरी के लिए थे। हालांकि एनएसई (कोड – NCC) में 8.32 लाख शेयरों के सौदों में से 5.14 लाख शेयर यानी 61.82 फीसदी डिलीवरी के लिए थे। इसलिए लगता है कि कहीं बीएसई ने आंकड़ों को छापने में गलती तो नहीं कर दी है!!!
वैसे, आंध्र प्रदेश की यह कंपनी बुरी नहीं है। पहले नागार्जुन कंस्ट्रक्शन कंपनी का नाम था। धंधा कंस्ट्रक्शन के दायरे से बढ़कर इंजीनियरिंग व पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर तक चला गया तो नाम बदलकर एनसीसी लिमिटेड कर लिया गया। और, ऐसा कोई बहुत पहले नहीं, बल्कि एक महीने पहले 27 फरवरी को ही हुआ है। रविवार के दिन कंपनी ने सूचना जारी करवा दी कि वह तत्काल प्रभाव से अपना नाम बदल रही है। फटाफट हर जगह उसका पुराना नाम गायब हो गया। वह नागार्जुन कंस्ट्रक्शन से एनसीसी लिमिटेड बन गई। क्या फर्क पड़ता है। शेक्सपियर भी कह गए हैं कि नाम में क्या रखा है।
कोई गफलत न हो, इसलिए बता दें कि इस कंपनी के संस्थापक व चेयरमैन ए वी एस राजू हैं। ए रंगा राजू उसके प्रबंध निदेशक हैं। तमाम राजुओं से भरे 16 सदस्यीय निदेशक बोर्ड के एक सदस्य राकेश झुनझुनवाला भी हैं। राकेश झुनझुनवाला ने इस कंपनी की 5.61 फीसदी इक्विटी खरीद रखी है। कंपनी की कुल इक्विटी 51.32 करोड़ रुपए है जो 2 रुपए अंकित मूल्य के शेयरों में बंटी है। इसमें प्रवर्तकों का हिस्सा मात्र 20.04 फीसदी है जिसका 18.24 फीसदी हिस्सा (कुल कंपनी की इक्विटी का 3.65 फीसदी) उन्होंने गिरवी रखा हुआ है।
कंपनी की इक्विटी में 35.41 फीसदी हिस्सेदारी एफआईआई की और 18.86 फीसदी हिस्सेदारी घ्ररेलू निवेशक संस्थाओं (डीआईआई) की है। नोट करने की बात यह है कि इसके बड़े निवेशकों (एक फीसदी से ज्यादा शेयर) में राकेश झुनझुनवाला के अलावा एचडीएफसी ग्रोथ फंड (5.27 फीसदी), एसबीआई म्यूचुअल फंड (1.96 फीसदी), ब्लैकस्टोन कैपिटल पार्टनर्स – मॉरीशस (8.33 फीसदी), टाटा म्यूचुअल फंड (2.36 फीसदी), यूटीआई इंफ्रास्ट्रक्चर एडवांटेज फंड (1.54 फीसदी) और एचएसबीसी, बिड़ला सनलाइफ, रिलायंस लाइफ, रिलायंस म्यूचुअल फंड और आईसीआईसीआई पूडेंशियल जैसे तमाम बड़े नाम शामिल हैं। अच्छी बात यह है कि इसमें एलआईसी या जीआईसी का नाम नहीं है।
जहां, इतने बड़े खिलाड़ी हों, वहां देर-सबेर खेल का होना स्वाभाविक है। असल में नागार्जुन कंस्ट्रक्शन का शेयर पिछले महीने 10 फरवरी 2011 को घटकर 86.35 रुपए पर चला गया जो 52 हफ्ते का उसका न्यूनतम स्तर है। अब भी बढ़ते-बढ़ते बड़ी मुश्किल से 94.95 रुपए पर आया है। डेढ़ महीने में 9.95 फीसदी बढ़त। कोई बुरी रफ्तार नहीं है। उस्ताद लोग इसे और खींचकर उठाने की पुरजोर कोशिश में हैं। इसीलिए इसमें वोल्यूम का बवंडर खड़ा किया जा रहा है।
हालांकि कंपनी वित्तीय रूप से दुरुस्त है। 2009-10 में इसने 4777.82 करोड़ रुपए की आय पर 232.62 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ कमाया था। इस साल दिसंबर 2010 की तिमाही में उसकी आय 1335.50 करोड़ और शुद्ध लाभ 40.43 करोड़ रुपए है। सालाना तुलना में जहां उसकी आय 13 फीसदी बढ़ी है, वहीं शुद्ध लाभ में 59.5 फीसदी की भारी कमी आई है। शायद यही इसके शेयरों के पिटने की ठोस वजह बन गई हो। कंपनी ने तिमाही नतीजे 4 फरवरी को घोषित किए थे। उसी के बाद इसकी धुनाई शुरू हुई है।
अन्य आंकड़ों की बात करें तो कंपनी का ठीक पिछले बारह महीनों का ईपीएस (प्रति शेयर शुद्ध लाभ) 8.98 रुपए है और मौजूदा भाव पर उसका शेयर 10.57 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है। शेयर की बुक वैल्यू उसके बाजार भाव के लगभग बराबर 92.50 रुपए है। जाहिरा तौर पर दिसंबर तिमाही की तात्कालिक कमजोरी के बावजूद कंपनी मूलभूत रूप से मजबूत है। इसका शेयर पिछले साल 22 जून 2010 को 197 रुपए की ऊंचाई पकड़ चुका है।
अंत में बस यही कहा जा सकता है कि जिन लोगों का यकीन उस्तादों के साथ बहने में है, उनके खेल में शिरकत का हो, वे एनसीसी में हाथ डाल सकते हैं। बाकी लोगों को कंपनी के ठीकठाक और शेयर के कम मूल्य पर होने के बावजूद इससे दूर रहना चाहिए क्योंकि सांड़ों की लड़ाई में सबसे ज्यादा सांसत जमीन की धूल और घास की ही होती है। हालांकि जोखिम उठानेवालों को कौन रोक सकता है। हमारा काम बताना था। सो आपको बता दिया। बाकी मर्जी आपकी।
