इतिहास गवाह है कि दुनिया का कोई भी देश मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को बढ़ाए बिना समृद्ध नहीं बन सका है। चाहे वो अमेरिका हो, जापान हो, दक्षिण कोरिया हो या चीन। भारत इसका अपवाद नहीं हो सकता। लेकिन मोदी सरकार मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को बढ़ाने के लिए केवल जुबानी जमाखर्च कर रही है। देश के जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का योगदान बारह सालों से 15-16% पर अटका हुआ है। पहले यूरोपीय संघ के साथ हुई संधि को वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को उठाने वाला बता दिया। फिर अमेरिका के साथ हुए अंतरिम व्यापार सहमति पर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स पर लिख मारा कि इससे मेक-इन इंडिया को मजबूती और विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी। लेकिन यह कैसे होगा, जबकि अमेरिका और भारत की तरफ से जारी संयुक्त आधिकारिक बयान में कहा गया है कि भारत अमेरिका के सभी औद्योगिक उत्पादों पर टैरिफ खत्म या घटा देगा। यहां तक कि अमेरिका से आयात किए जानेवाले कृषि उत्पादों की व्यापक रेंज पर भी टैरिफ घटाया या शून्य कर दिया जाएगा। आखिर इस वचनबद्धता के बाद भारत का मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र कैसे बढ़ सकता है? इसी की भूमिका बनाने के लिए बजट में 2047 तक सेवा क्षेत्र को बढ़ाकर विश्व बाज़ार के 10% पर छा जाने का सब्ज़बाग दिखाया गया है। अब मंगलवार की दृष्टि…
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