हमारे शेयर बाज़ार का मूल्यांकन बहुत चढ़ा हुआ है। दुनिया में अमेरिका को छोड़ दें तो चीन व हांगकांग से लेकर यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया व ब्राज़ील तक के बाज़ार पी/ई अनुपात के पैमाने पर भारत से बहुत सस्ते हैं। क्या यह विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के भारत से पलायन की प्रमुख वजह नहीं है? क्या आपको नहीं लगता कि भारतीय शेयर और वहां ट्रेड हो रही तमाम अच्छी कंपनियों के शेयरों का मूल्यांकन बहुत ज्यादा है? यह सवाल जब शुक्रवार को पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पाण्डे से पूछा गया तो उनका कहना है कि मूल्यांकन कोई ऑब्जेक्टिव नहीं, बल्कि सब्जेक्टिव मामला है यानी वस्तुपरक नहीं, व्यक्तिपरक। इसे वर्तमान नहीं, भविष्य को ध्यान में रखकर निकाला जाता है। इसलिए हम नहीं कह सकते कि मूल्यांकन ज्यादा चल रहा है। पाण्डे जी 1987 बैच के ओडिशा कैडर के आईएएस अफसर हैं। इससे पहले वे केंद्र सरकार में राजस्व सचिव हुआ करते थे। दिक्कत यह है कि सेबी की कुर्सी संभालकर भी वे सरकार की ही चाकरी बजा रहे हैं। सरकार द्वारा विकास के नाम पर रचे गए ताश महल की प्रशस्ति उनकी मजबूरी है। उनसे सत्य की उम्मीद नहीं की जा सकती। अब तथास्तु में आज की कंपनी…
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