क्या विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय शेयर बाज़ार से इसलिए भाग रहे हैं क्योंकि डूबते जहाज को छोड़कर सबसे पहले चूहे भागते हैं? क्या भारत वाकई मरी हुई अर्थवयवस्था है? फिर वो सितंबर तिमाही में 8.2% कैसे बढ़ गई? सवाल अनेक हैं। संदेह का कोहरा बहुत घना हो चुका है, दिल्ली के प्रदूषण से भी गहरा। मोटी बात यह है कि विदेशी निवेशक भारत छोड़ इसलिए भागे हैं क्योंकि दिसंबर 2024 से दिसंबर 2025 के बीच अमेरिका के शेयर सूचकांक 17-23%, चीन के 16-27%, लंदन का फुटसी सूचकांक 18%, यूरोप का 16%, हांगकांग का 27%, जापान का 22-27% और कोरिया तो 72% तक बढ़ा है, जबकि इस दौरान हमारा सेंसेक्स व निफ्टी बमुश्किल 8% बढ़ा है। जहां फायदा, निवेशक वहीं तो जाएंगे। गंजेड़ी यार किसके, दम लगाकर खिसके। डॉलर के मजबूत और रुपए के कमज़ोर होने की एक अन्य वजह हमारा व्यापार घाटा है। साथ ही यह भी हुआ कि इस साल जब रुपया डॉलर के मुकाबले गिरा जा रहा था, तब रिजर्व बैंक ने उसे बचाने के लिए स्पॉट से कहीं ज्यादा फॉरवर्ड बाज़ार में डॉलर की बिक्री की। फिर भी रुपए को न बचाया जा सका क्योंकि अमेरिका ने भारत पर दुनिया का जो सबसे ज्यादा 50% टैरिफ लगाया है, उसका समाधान नहीं निकला है। वैसे, बैंक ऑफ बड़ौदा के मुताबिक केवल आर्थिक वजहों से ही रुपया नहीं गिरा है। अब शुक्रवार का अभ्यास…
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