रुपए-डॉलर की विनिमय दर किसी की सदिच्छा या साजिश से नहीं, बल्कि बाज़ार शक्तियों के संतुलन या कहें तो डिमांड-सप्लाई के समीकरण से तय होती है। जिस मुद्रा की मांग ज्यादा, उसका महंगा होना तय है। भारत चूंकि हमेशा आयात ज्यादा और निर्यात कम करता है तो यहां डॉलर की मांग ज्यादा रहती है। इसलिए डॉलर का महंगे होते जाना स्वाभाविक है। हम चीन की तरह नहीं हैं, नवंबर महीने में जिसका व्यापार सरप्लस या अधिशेष एक ट्रिलियन (एक लाख करोड़) डॉलर के पार चला गया। भारत का माल निर्यात नवंबर में 19% बढ़कर 3813 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया। फिर भी हमारा व्यापार घाटा 2400 करोड़ डॉलर का है। इस तरह हमारे यहां से डॉलर निकलता ज्यादा और आता कम है। सवाल उठता है कि देश में डॉलर आता कहां-कहां से है? यह आता निर्यात, कंपनियों की विदेशी आय, विदेशी निवेशकों के शेयरों व बॉन्डों में निवेश, फैक्ट्रियों वगैरह में लगनेवाले एफडीआई और विदेश में रह रहे भारतीयों के वापस धन भेजने से। दिक्कत यह है कि इन सभी माध्यमों से जितने डॉलर आ रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा बाहर निकल रहे हैं। मसलन, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने साल 2025 में शेयर बाज़ार से करीब ₹1.70 लाख करोड़ (19 अरब डॉलर) निकाले हैं। अप्रैल-सितंबर 2025 में शुद्ध एफडीआई मात्र 7.6 अरब डॉलर रहा है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…
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