ढोल को कितनी भी ज़ोर से पीटा जाए, एक न एक दिन उसकी पोल खुल ही जाती है। मोदी सरकार ने देश के राष्ट्रीय खातों का जो हाल किया है, उसकी पोल अब आईएमएफ जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था ने खोल दी है। सवाल पूछे जाने लगे हैं कि मुद्रास्फीति से लेकर जीडीपी तक के आंकड़े ज़मीनी हकीकत से मेल क्यों नहीं खाते? जब देश की लगभग 90% अर्थव्यवस्था अनौपचारिक या असंगठित क्षेत्र में है, तब 10% संगठित क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को फैलाकर सारी की सारी अर्थव्यवस्था के 8.2% बढ़ने का स्वांग कैसे स्वीकार कर लिया जाए? वहीं, आमजन का सवाल यह है कि जब जीडीपी इतना ही बढ़ रहा है तो संगठित क्षेत्र में रोज़गार क्यों नहीं बढ़ रहे? नोटबंदी, जीएसटी और कोरोना की महामारी ने संगठित और असंगठित क्षेत्र के जिस भयावह अंतर को उजागर किया था, उसे अभी तक कितना भरा गया है? हमारी तकरीबन 46% श्रमशक्ति अब भी कृषि में लगी हुई है जिसकी विकास दर मात्र 3.5% रही है तो जीडीपी आखिर बढ़ कहां से रहा है और उसके बढ़ने का मतलब क्या है? जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा 14% से ऊपर क्यों नहीं जा पा रहा है तो इसमें रोजगार पैदा कहां से होगा? ऊपर से करोड़ों गरीबों को रोज़गार देनेवाली योजना को मिटाकर ‘राम नाम सत्य’ कर दिया! अब शुक्रवार का अभ्यास…
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