शेयरों के भाव इतने हैरान-परेशान क्यों!

इस सच से कोई इनकार नहीं कर सकता कि अपने शेयर बाज़ार में 95% ट्रेडर गंवाते और केवल 5% ट्रेडर ही कमाते है। सालों-साल से इस सच पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा। खुद पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी ने ब्रोकरों से डेटा लेकर इस हकीकत की पुष्टि अपनी कई अध्ययन रिपोर्टों में की है। लेकिन हम ब्रोकरों से लेकर एनालिस्टों, स्टॉक एक्सचेंजों और सेबी व सरकार तक से उम्मीद नहीं कर सकते कि वे बाज़ार में गंवानेवाले 95% ट्रेडरों को समझदारी सिखाएंगे क्योंकि इससे इन सभी की करोड़ों-अरबों की कमाई घट जाएगी। ध्यान दें कि बाज़ार में गंवानेवाले सारे के सारे ट्रेडर रिटेल या व्यक्तिगत ट्रेडर हैं। इन सभी को ढाई हज़ार पुरानी बुद्ध की सीख व परम्परा पर चलते हुए अपना दीपक खुद बनना होगा। दूसरा केवल राह दिखा सकता है, उस पर चला नहीं सकता। हर रिटेल ट्रेडर को बाज़ार में सफलता हासिल करने के लिए खुद का मनोविज्ञान और मॉडल विकसित करना होगा। यह मॉडल कैसे विकसित किया जाए, इसमें मदद के लिए आज से हम ट्रेडिंग से जुड़ी बुनियादी बातों पर एक लेख श्रृंखला शुरू कर रहे हैं। इसमें हर हफ्ते आएगा एक नया लेख। कुल मिलाकर यह क्रम तीन महीने तक चलेगा। उसके बाद 8 दिसंबर से यह कॉलम पहले की तरह सब्सक्राइबरों तक सीमित हो जाएगा। तब तक यह कॉलम सबके लिए खुला और पूरी तरह फ्री है।…

अप्प दीपोभव: नई सीख के लिए बेहद ज़रूरी है कि पहले जो सीखा है, उसे धो-पोंछकर साफ लिया और क्लीन स्लेट से शुरुआत की जाए। बुद्ध तो यहां तक कहते थे कि हर नए दिन की शुरुआत पिछले दिन तक मन में जमा हुए कचरे को साफ करने से होनी चाहिए। तभी हम जीवन की चुनौतियों को जीतते हुए आगे बढ़ सकते हैं। कमोबेश हर रिटेल ट्रेडर कहीं न कहीं मानकर चलता है कि बाज़ार में कुछ उस्ताद लोग होते हैं जो जानते हैं कि बाज़ार या किसी शेयर की अगली चाल क्या होगी। अगर उनमें से कोई हमें बता दे तो हम भी कमा सकते हैं। अपने यहां संस्कृत में भी पुरानी कहावत है – महाजनो येन गतः स पन्थाः। किसी समय व परिस्थिति में यह उक्ति सच रही होगी। लेकिन आज तो शेयर बाज़ार में ऐसे ‘महाजनों’ के चक्कर में साधारण निवेशक व ट्रेडर की सारी पूंजी ही डूब जाती है।

इसलिए सबसे पहले हमें मन में गहरे पैठी इस धारणा को निकालना होगा कि कुछ उस्ताद सब कुछ जानते हैं। इसी से जुड़ी बात है कि किसी यार-दोस्त या एनालिस्ट की टिप्स को दूध में मरी हुए मक्खी की तरह उठाकर बाहर फेंक देना चाहिए। टिप्स से निकल गए तो तमाम रिटेल ट्रेडर ऑपरेटरों के खेल में फंस जाते हैं। ऐसे ऑपरेटर अक्सर कंपनियों के प्रवर्तकों या बड़ी संस्थाओं व निहित स्वार्थी समूहों के साथ मिलकर खेल करते हैं। इनमें यकीनन बाज़ार या किसी स्टॉक को उठाने-गिराने का माद्दा होगा। लेकिन आम ट्रेडरों के लिए ये ऑपरेटर किसी चड्ढ़ी-बनियान गैंग से कम नहीं। हमें इनसे भी दूर रहना चाहिए। यही नहीं, पता चल जाए कि किन्हीं स्टॉक्स में ऑपरेटर्स सक्रिय हैं, उनसे भी मीलों का फासला बना लेना चाहिए।

ज़रा हटके, ज़रा बचके: टिप्स और ऑपरेटरों से परे हटकर हम सबसे पहले समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर स्टॉक्स के भाव इतने हैरान-परेशान से क्यों रहते हैं, वे इतना उछलते-कूदते क्यों रहते हैं। निवेशक इसके लिए कंपनी की फंडामेंटल एनालिसिस में जाकर कारण तलाश सकता है। वो कंपनी से जुड़ी खबरों के तमाम स्रोतों की खाक छान सकता है। लेकिन ट्रेडर के लिए इतनी मगजमारी करने की कोई ज़रूरत नहीं। उसके लिए खबरों का पीछा करना बेकार है क्योंकि खबर उजागर होने के पहले ही शेयरों के भावों पर असर डाल चुकी होती है। ध्यान रहे कि न हमें कंपनी की सटीक खबर सबसे पहले मिल सकती है और न ही कौन उसमें खरीद या बिक्री कौन व कितनी कर रहा है, इसकी सटीक जानकारी समय पर मिल सकती है। ट्रेडिंग में तीर निशाने पर लगाने के लिए ये जानकारियां बेहद ज़रूरी हैं। लेकिन ये जानकारियां मिलनी असंभव हैं, इसलिए कयासबाज़ी से काम चलाना पड़ता है। लेकिन कयासबाज़ी में शुद्ध पागलपन न हो, इसका ध्यान रखना पड़ता है। सवाल उठता है कि madness में method को कैसे सुनिश्चित किया जाए?

Method in Madness: सबसे पहले तो जान लें कि भारतीय शेयर बाज़ार आज बहुत बड़ा हो चुका है। देश के लगभग हर पिन कोड तक किसी न किसी रूप में पहुंच चुका है। शेयर बाज़ार में देश की लिस्टेड कंपनियों के मालिकाने का सौदा सुबह 9.15 बजे से शाम 3.30 बजे तक होता है। वहां मालिकाना हासिल करने की बोलियां लगती हैं। पहले ये बोलियां हल्ला मचाकर लगाई जाती थीं। अब सब कुछ ऑनलाइन बिना कोई शोर मचाए होता है। एक साथ एक ही समय लाखों लोग लगे रहते हैं। लेकिन ध्यान रहे कि मालिकाने का सौदा वही लोग कर सकते हैं जिनके पास इफरात धन है। जिनके लिए घर-परिवार चलाने और हारी-बीमारी से निपटने का इंतज़ाम करना ही मुश्किल होता है, वे आखिर शेयर बाज़ार में आकर किसका और कौन-सा मालिकाना खरीद सकते हैं? अगर ऐसे लोग शेयर बाज़ार में आते भी हैं तो लॉटरी खेलने की मानसिकता के साथ क्योंकि उन्हें लगता है कि यहां धन का समुंदर हिलोरे मार रहा है जिसमें से एक-दो लोटा या बाल्टी भर धन वे आराम से उलीचकर साथ ले जा सकते हैं। यह अलग बात है कि इस लालच में फंसकर उनकी मामूली जमापूंजी भी स्वाहा हो जाती है।

यह भी मन में कहीं गहरे बैठा लें कि ट्रेडिंग मरमच्छ के जबड़े से शिकार खींचकर लाने जैसा काम है। यहां हर कोई छोटे या रिटेल ट्रेडरों का शिकार करने के लिए बैठा है। कोई उसका हितैषी नहीं। कहा भी गया है कि घोड़ा घास से यारी करेगा तो खाएगा क्या! सेबी, सरकार, ब्रोकर, बिजनेस चैनल, उन पर आनेवाले एनालिस्ट और तमाम पत्र-पत्रिकाएं, अखबार व वेबपोर्टल व्यक्तिगत ट्रेडरों के सामने लालच का चारा फेंकते रहते हैं। फंस गए तो वे चड़ढी तक उतार ले जाते हैं।

इफरात धन के प्रवाह का खेल: अब थोड़ी गहरे उतरने की कोशिश करते हैं। कायदे से जान-समझ लें कि अर्थव्यवस्था में जो धन झलक कर बाहर बहता है, शेयर बाज़ार उसी का खेल है। रोज-ब-रोज़ इस खेल से रू-ब-रू होना समुंदर में उफान की लहरों को देखने जैसा थ्रिल देता है। इस पर बड़े-बड़े ट्रेडर सर्फिंग का आनंद भी लेते रहते हैं। लेकिन आम ट्रेडर व निवेशक को किनारे बहकर आए सीप व मोतियों को चुनकर ही संतोष करने की आदत डाल लेनी चाहिए। वो इससे ज्यादा जोखिम उठाने की कोशिश करेगा तो इफरात धन के प्रवाह की लहरें उसे कहीं दूर ले जाकर पटक सकती हैं।

दुनिया भर में धन का महासागर यहां से वहां तक फैला है। यह अबाध है, अपार है, अक्षुण्ण है। उसकी लहरें जिस छोर का रुख कर लें, वहीं का शेयर बाज़ार कुलांचे मारने लगता है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) आज भारतीय शेयर बाज़ार के सबसे पड़े खिलाड़ी बन चुके हैं। उनके अपार धन के प्रवाह के पीछे के तर्क इतने बारीक, जटिल व व्यापक होते हैं कि इंसान को लगता है कि इससे पार पाना मुश्किल है तो इनकी थाह में पड़ने के बाद इसकी चाल रैण्डम कह देना ही ज्यादा युक्तिसंगत व सही होगा। बाकी रिस्क की कला और जुगत से सब संभाल लिया जाएगा। ऊपर से इस रिस्क में थ्रिल की सुरसुरी भी जुड़ जाती है तो सोने में सोहागा।

अमेरिका से लेकर यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और एशिया तक। हर तरफ बिखरे इफरात धन वाले चौबिसों घंटे तलाश में रहते हैं कि कहां धन डालकर ज्यादा धन खींचा जा सकता है। कोई छोटे से छोटा देश भी उनकी गिद्ध निगाहों से नहीं बचता। फिर भारत तो बहुत बड़ा देश है जो फिलहाल दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है, जल्दी ही चौथी और फिर दो-तीन साल में तीसरी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है। लेकिन भारत के ट्रेडर ही सुस्त पड़ जाएं, समुंदर शांत हो जाए, मछलियां उछल-कूद मचाने ऊपर न आएं तो शिकारी सीगल चिड़िया कैसे शिकार कर सकती है। इसलिए देशी सक्रियता को बढ़ाना ज़रूरी है।

देशी सक्रियता, समझदारी के साथ: ट्रेडिंग में देशी सक्रियता समझदारी की बुनियाद पर टिकी होनी चाहिए। हर दिन रिटेल ट्रेडर को बाज़ार में उतरने से पहले जान-समझ लेना चाहिए कि ठीक पिछले दिन देशी-विदेशी संस्थाओं (डीआईआई और एफआईआई) की शुद्ध खरीद या बिकवाली कितनी रही है? साथ ही दुनिया में धन का प्रवाह कैसा चल रहा है? पिछले दिन लंदन से लेकर अमेरिका तक के शेयर बाज़ार का क्या हाल रहा? फिर देखें कि आज दोपहर तक ऑस्ट्रेलिया के शेयर बाज़ार का माहौल क्या चल रहा है? उसके बाद नज़र डाल लें कि एशिया में जापान व दक्षिण कोरिया के शीर्ष सूचकांकों की स्थिति क्या है? फिर देखें कि सुबह 8.15-8.30 बजे तक निफ्टी-50 का अंतरराष्ट्रीय फ्यूचर्स SGX निफ्टी / GIFT निफ्टी क्या संकेत दे रहा है? इसका बढ़ना या घटना नहीं, बल्कि स्तर देखना पड़ता है कि वो निफ्टी-50 के कल के कैश बाज़ार के स्तर से कितना ऊपर-नीचे है? इससे दुनिया से लेकर देश तक में शेयर बाज़ार में बहकर आ रहे धन के प्रवाह का अंदाजा लगता है। लेकिन इतना सब जान लेने के बाद भी शेयर बाज़ार का रिस्क खत्म नहीं होता। उसे तो हमें उठाना ही पड़ता है। ट्रेडिंग भी एक तरह का इश्क है जिसके बारे में जिगर मुरादाबादी ने क्या खूब लिखा है:

ये इश्क़ नहीं आसां इतना ही समझ लीजे। इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।।

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