शेयर बाज़ार में हम-आप जैसे ट्रेडर-निवेशक खरीदने-बेचने के जो भी सौदे करते हैं, उनकी स्पष्ट लागत होती है जो हर हाल में बिचौलियों से लेकर सरकार तक को मिलती है। सेबी के एक विश्लेषण के मुताबिक वित्त वर्ष 2021-22 में ट्रेडिंग में घाटा खानेवाले ट्रेडरों को इसका 28% हिस्सा घाटे के ऊपर सौदों की लागत के रूप में देना पड़ा था। जिन ट्रेडरों ने ट्रेडिंग में मुनाफा कमाया, उनके मुनाफे का लगभग 50% हिस्सा ट्रांजैक्शन लागत में चला गया। आखिर हमारी चुकाई लागत किस-किसके पास जाती है। केंद्र सरकार को सिक्यूरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (एसटीटी) के रूप में वित्त वर्ष 2014-15 में ₹6426 करोड़ मिले थे जो 2024-25 तक ₹55,000 करोड़ पर पहुंच गया। इसका 40% से ज्यादा हिस्सा एफ एंड ओ ट्रेडिंग से आया। एक्सचेंजों में एनएसई को 2024-25 में कुल आय का 90% (₹15,000 से ₹16,000 करोड़) डेरिवेटिव्स से मिला है। सीडीएसएल और एनएसडीएल जैसी डिपॉजिटरी की कमाई अलग। ब्रोकरों का हिसाब निकालना मुश्किल है। लेकिन सेबी चाहती तो अपने हाल की अध्ययन रिपोर्ट में बता सकती थी कि देश के शीर्ष 13 ब्रोकरों को निवेशकों व ट्रेडरों से ब्रोकरेज के रूप में कितना मिला है। खुद सेबी की बात करें तो वित्त वर्ष 2023-24 में उसकी ₹1851 करोड़ की आय में से ₹1066 करोड़ टर्नओवर आधारित फीस से मिले थे। अब शुक्रवार का अभ्यास…
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