जेन स्ट्रीट के खिलाफ सेबी ने कहा था, “बाजार की प्रामाणिकता और लाखों छोटे निवेशकों के भरोसे को अब ऐसे अविश्वसनीय धंधेबाज़ की चालों का बंधक नहीं बनाया सकता।” लेकिन सेबी ने एस्क्रो खाते में अपने नाम से जेन स्ट्रीट के ₹4844 करोड़ डालते ही उसका गुनाह माफ कर दिया! यह विकसित देश बनने की कैसी यात्रा है? विकसित देशों में चाहे वो पॉन्ज़ी स्कीम हो या वित्तीय बाज़ार का कोई दूसरा फ्रॉड, दोषियों से वसूली करने के बाद मिली रकम सारे प्रभावित निवेशकों के बीच ढूंढ-ढूंढकर बांट दी जाती है। लेकिन यहां तो अवैध कमाई की सारी रकम खुद सेबी अपने खाते में जमा करा ले रही है! यह पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी का कैसा स्वार्थ और फैसला है कि वो हमारे शेयर बाज़ार के कैश और एफ एंड ओ या डेरिवेटिव सेगमेंट में बड़े व परस्पर जुड़े सौदों के खेल से इक्विटी इंडेक्स को मनचाहे स्तर पर पहुंचाने की दोषी अमेरिकी फर्म को छुट्टा छोड़ दे रही है? वो भी तब, जब इन सौदों से जेन स्ट्रीट ने लाखों मासूम रिटेल निवेशकों को नुकसान पहुंचाकर ₹4844 करोड़ का मुनाफा कमा लिया हो? क्या हमारे शेयर बाजार, खासकर इक्विटी डेरिवेटिव बाज़ार में यूं ही लूट चलती रहेगी? फिर ज्यादा निगरानी, मार्जिन बढ़ाने, एक्सपायरी दिन के सौदों पर अंकुश लगाने और ऑप्शंस ट्रेडिंग के रिस्क पर रिटेल निवेशकों को शिक्षित करने का क्या फायदा! अब बुधवार की बुद्धि…
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