देश में जीडीपी के साथ और जीडीपी के नाम पर ऐसा खेल चल रहा है, जिसे अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और बड़े-बड़े अर्थशास्त्री नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, जबकि अवाम बबूचक बना हुआ है। इस बीच अबूझ पहेली है कि जब सब कुछ इतनी तेज़ी से बढ़ रहा है तो आम उपभोक्ता ही नहीं, कॉरपोरेट क्षेत्र तक में क्षमता इस्तेमाल का स्तर और लाभप्रदता अटकी क्यों है? यकीनन भारत इस समय दुनिया की सबसे तेज़ बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है। आईएमएफ के मुताबिक अगले पांच सालों तक ऐसा ही रहेगा। लेकिन देश के जीडीपी में चौसर का खेल रीयल व नॉमिनल विकास दर और रिटेल व थोक मुद्रास्फीति की चार गोटों से खेला जा रहा है। थोक मुद्रास्फीति कई सालों के कम चल रही है तो सरकार जीडीपी की नॉमिनल या वर्तमान मूल्यों पर चल रही विकास दर से रिटेल मुद्रास्फीति के बजाय उसे घटाकर रीयल या असली विकास दर निकालने लगी। इससे रीयल विकास दर ज्यादा दिखने लगी, जिसे सभी मानते हैं। लेकिन जीडीपी की नॉमिनल विकास दर पिछले छह सालों से लगातार 10% से नीचे चल रही है। इसमें से कोरोना महामारी में डूबे वित्त वर्ष 2020-21 का अपवाद हटा दें तो यह 2019-20 में 3.7% और 2024-25 में 9.8% रही है। नॉमिनल विकास दर की यह सुस्ती वो नंगा सच दिखाती है कि देश में जनता लस्त और कॉरपोरेट पस्त क्यों है? अब शुक्रवार का अभ्यास…
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