गजब की विडम्बना है। एक तरफ भारत सरकार अपना 96% ऋण देश के आम लोगों की बचत या बैंक डिपॉजिट से हासिल कर रही है, वहीं दूसरी तरफ इन्हीं आम लोगों को घर-खर्च और खपत को पूरा करने के लिए कर्ज लेना पड़ रहा है। रिजर्व बैंक की ताज़ा फाइनेंशियल स्टैबिलिटी रिपोर्ट बताती है कि मार्च 2025 तक भारतीय परिवारों ने जो ऋण ले रखा है, उसका 54.9% हिस्सा घर या जेवरात खरीदने के लिए नहीं, बल्कि नॉन-हाउसिंग लोन है जो मुख्य रूप से रोजमर्रा की ज़रूरत या खपत को पूरा करने के लिए लिया गया है। यही नहीं, देश में जो प्रति व्य़क्ति ऋण मार्च 2023 में 3.9 लाख रुपए हुआ करता है, वो मार्च 2025 तक 23.08% बढ़कर 4.8 लाख करोड़ रुपए हो गया है। इतना बताने के बाद भारतीय रिजर्व बैंक केंद्र सरकार को खुश करने के लिए भारतीय अवाम की इस दारुण स्थिति पर तालियां बजाता नजर आता है। उसका कहना है कि दिसंबर 2024 तक भारतीय परिवारों पर चढ़ा ऋण जीडीपी का सिर्फ 41.9% है जो दुनिया की अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं या देशों की तुलना में अपेक्षाकृत कम है। कैसी विचित्र स्थिति है कि जहां, मोदी सरकार मंत्रियों-संत्रियों व तंत्र की मौजमस्ती के लिए देश को कर्ज में डुबाती जा रही है, वहीं देश के अवाम को जिंदगी चलाने के लिए बैंकों या गैर-बैकिंग कंपनियों (एनबीएफसी) से कर्ज लेना पड़ रहा है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…
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