हमारी 146 करोड़ की आबादी में से 5-6 करोड़ लोगों को छोड़ दें तो बाकी 140 करोड़ बिंदास नहीं, बल्कि अंदर से हारे व भयग्रस्त लोग हैं। उन्हें खुद अपनी ताकत पर भरोसा नहीं। उनमें जीत का अहसास भरने के लिए कभी टीम इंडिया के किसी शुभमन गिल की डबल सेंचुरी चाहिए तो कभी अतीत का महिमागान, विश्वगुरु का बखान या भारत का दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाना और फिर जल्दी ही चौथे और तीसरे स्थान पर पहुंच जाना। वे यथार्थ के सवालों से टकराना नहीं, भागना चाहते हैं। हमारे छलिया राजनेता आम भारतीयों की इसी मनोदशा को कामधेनु की तरह दुह रहे हैं। उनसे कोई नहीं पूछता कि भारत अगर 2014 से हर मोर्चे पर दिन-दूनी, रात-चौगुनी उन्नति कर रहा है तो 2006 से ही अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों ने उसकी रेटिंग निवेश के न्यूमतम ग्रेड पर क्यों रख रखी है? बीच में मूडीज़ ने भारत की रेटिंग 2017 से 2020 तक तीन साल तक एक पायदान उठाई थी। लेकिन फिर पुराने स्तर पर पटक दिया। भारत अगर इस रेटिंग से एक पायदान भी नीचे खिसका तो उसे निवेश करने लायक भी नहीं माना जाएगा। तब ऋण-ग्रस्त देश को कोई ऋण भी नहीं देगा। भारत इस समय जी-20 देशों में रेटिंग के मायने में 15वें स्थान पर है। फिर आखिर दुनिया की पांचवीं, चौथी या तीसरी अर्थव्यवस्था बन जाने का क्या मतलब रह जाता है? अब मंगलवार की दृष्टि…
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