सुधार इतने नाकाम क्यों?

।।राकेश मिश्र।।*

उदारवादी व्यवस्था में भारतीय राजस्व और अर्थशास्त्र के आज़ादी के पचास सालों में तैयार किए गए गहन मूलभूत सिद्धांतों और व्यवस्था के आधारभूत तत्वों को तथाकथित नए उदारवादी मानकों के अनुसार तय किया जाने लगा। यह दौर शुरू हुआ आर्थिक उदारीकरण के दूसरे चरण में 1998 के दौरान। इस दौर के अर्थशास्त्रियों की समाजशास्त्रीय समझ के अति उदारीकरण का परिणाम यह निकला कि देश में महंगाई की अवधारणा और मूल्य सूचकांक के मानक आधुनिक अर्थशास्त्र के तथाकथित पितामह एडम स्मिथ के मानसपुत्रों ने निर्धारित करना शुरू कर दिया। अजीब बात है कि मुद्रास्फीति भले ही घट जाए, लेकिन आम लोगों पर महंगाई की मार नहीं कम होती।

जैसा कि स्वयं एडम स्मिथ जनमानस के साथ न्याय करने में अक्षम रहे, वही अक्षमता और उसके मानसपुत्रों के कामों का प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था और समाजशास्त्र पर साफ़ नज़र आता है। नतीजा जनसामान्य महंगाई से कराह रहा है। उसके बावजूद पिछले सात वर्षों में वित्तीय संकटों में वित्त मंत्रियों के आश्वासन भी सामान्य घटना जैसे लगने लगे हैं। इतनी भयावह आर्थिक हालात के बावजूद किसी पक्ष से कोई विवेचन नहीं मिलता है जिससे यह पता लग सके कि देश की अर्थव्यवस्था में आधारभूत गड़बड़ियां क्या हुईं हैं? क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि हमारे सरकारी विद्वान जुआघरों की तर्ज़ पर चल रही भारतीय अर्थव्यवस्था के समग्र विवेचन और सुधार में नाकाम साबित हुए हैं। इनमें से एक हमारे देश के माननीय प्रधानमंत्री जी भी हैं।

इस प्रकार की परिस्थितियों में पश्चिमी पूंजीवाद की प्रत्यक्ष तौर पर कितनी भागीदारी है? हम इस लेख में विश्व अर्थव्यवस्था में इसकी उत्पत्ति और उसके जनमानस पर प्रभावों और विश्वव्यापी वित्तीय संकटों का समग्र विवेचन जनहित में करना अपना कर्तव्य मानते हैं।

हम अमेरिकी अर्थव्यवस्था के पूंजीवाद के नियंत्रण के गहन सिद्धांतों की समीक्षा करते हैं तो पाते हैं कि अमेरिकी नीति निर्माताओं ने जो मानक जनहित के अनुरूप तय किए, उसका सबसे ज्यादा दुरूपयोग  पूंजीवादियों ने किया। मुक्त बाज़ार व्यवस्था के स्वतंत्र प्रतियोगी सरकार के राजनीतिक नियंत्रण से बाहर विशाल औद्योगिक घरानों में विकसित हो गए। नतीजा बाज़ार का मूल्य नियंत्रण इन्हीं औद्योगिक समूहों के हाथों में चला गया।

हम समग्र विवेचन करें तो पाएंगे कि भारतीय अर्थव्यवस्था कैसे इन उदारवादी नीतियों से चिरकालीन विषम परिस्थितियों बीच घिरकर रह गयी है। इस प्रकार की परिस्थितियों की भयावहता के साथ में तथाकथित विकास की मृग मरीचिका और भारतीय नेतृत्व शून्य अभिदृष्टि ने देश के जनमानस को भी विचारशून्य अवस्था में लाकर खड़ा कर दिया है। किसी भी व्यक्ति का यह कहना ‘हम कर भी क्या कर सकते हैं’ अगर देश की नियति बन चला है तो कहा नहीं जा सकता कि वर्तमान भारत दुर्दशा देश को कहां ले जाएगी। फिर भी हम अपने सुधि-सुविज्ञ उदारवाद प्रेमियों को कुछ तथ्यों से जरूर अवगत करवाना चाहेंगे।

पिछले एक दशक में देश के नेतृत्व की सारहीन अभिदृष्टि ने देश को गुट निरपेक्ष आन्दोलन से निकालकर ऐसी जगह लाकर खड़ा कर दिया है जहां भारत अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था और आर्थिक सुरक्षा दोनों का एक जरूरी हिस्सा जैसा बन चुका है। मतलब हमारी आर्थिक नीतियां अमेरिका में अमेरिकी हितों के लिए बनती हैं। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं लगता है।

अमेरिकी व्यापारिक और साम्राज्यवादी हितों में लगी कम्पनियां उदारीकरण और विनिवेश की आड़ में देश को उनकी पूर्ववर्ती ईस्ट इंडिया कंपनियों की भांति कैसे चूस सकती हैं, यह शायद उनके 200 साल के इतिहास से भी हम नहीं सीख सके हैं। ईस्ट इंडिया कंपनियों ने विभिन्न राष्ट्रीयताओं और छद्म आवरणों के साथ चीन, अफ्रीका और भारत जैसे देशों में उपलब्ध संसाधनों का मुक्त बाज़ार व्यवस्था व वैश्विक बाज़ार व्यवस्था के नाम पर दोहन करते हुए जनमानस का कितना शोषण किया है, क्या हमारे नीति निर्माताओं को इसका अंदाज़ा नहीं है? नतीजा वे आज सर्वशक्तिमान हैं। इस प्रकार के एकाधिकारवादी पूंजीवाद के विरुद्ध जिस प्रकार के निर्णय अमेरिकी न्यायालय ने सौ वर्ष पूर्व लिये थे, आज उन्हीं को पीछे छोड़ के ये महाशक्तिमान कम्पनियां स्वयं अमेरिकी अर्थव्यवस्था और राजनीति पर हावी हो चली हैं।

किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता के तीन मूल मानक हैं: आर्थिक संप्रभुता या स्वायत्तता, खाद्यान्न आत्मनिर्भरता और सामरिक संप्रभुता। इनमें से खाद्यान्न आत्मनिर्भरता हमारे राष्ट्र पिता महात्मा गांधी की अभिदृष्टि थी, जिसका उद्देश्य था ग्राम स्वराज या इकाई आधारित आत्मनिर्भरता। अंततः हमें उसी व्यवस्था की परिधि में आना होगा, जो कतिपय कारणों से आज तक राष्ट्रीय राजनीति से अलग है। इस पर भी हमारा सुझाव है कि यदि देश की शिक्षा व्यवस्था में ही इसे समाविष्ट किया जाए ताकि बहुत ज्यादा देर हो जाने से पहले शायद हम इन विषमतर परिस्थितियों से बाहर निकल सकें।

– लेखक सामाजिक अनुसंधान में लगे जुझारू व्यक्ति हैं। पुनर्नव भारत से जुड़े हैं। उनसे rakesh.rgec@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। *ये लेखक के स्वतंत्र विचार हैं। अर्थकाम का उनसे सहमत होना जरूरी नहीं।

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