सुरक्षा या लूट का बिल!

।। एस पी सिंह ।।

ध्वस्त राशन प्रणाली पर खाद्य सुरक्षा विधेयक का बोझ डालने का सीधा मतलब खाद्य सब्सिडी में दोगुनी लूट है। सरकार इसी मरी राशन प्रणाली के भरोसे देश की तीन चौथाई जनता को रियायती मूल्य पर अनाज बांटने का मंसूबा पाले बैठी है, जबकि उसी के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक 60 फीसदी रियायती दर वाला गेहूं और 20 फीसदी चावल गरीबों तक पहुंचने से पहले ही लूट लिया जाता है।

पिछले वित्त वर्ष 2010-11 के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक राशन प्रणाली ध्वस्त हो चुकी है। इसमें आधे से ज्यादा अनाज का लीकेज (चोरी) हो जाता है। अनाज की यह लूट भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के गोदामों से लेकर राशन के दुकानदारों तक फैली है। प्रणाली में सुधार के सारे उपाय नाकाफी साबित हुए हैं। इन तथ्यों से वाकिफ होने के बावजूद सरकार इसी चरमराई प्रणाली पर दोहरा बोझ डालने का मंसूबा पाले बैठी है। आखिर क्या है उसकी नीयत?

राशन प्रणाली में फिलहाल 35 करोड़ लोगों को राशन वितरित किया जाता है। जबकि प्रस्तावित विधेयक में अब 80 करोड़ लोगों को राशन देने का प्रावधान है। जाहिर है मौजूदा राशन प्रणाली के लिए यह बड़ा बोझ होगा। दूसरे शब्दों में कहें तो राशन अनाज की लूट बढ़कर दोगुनी हो जाएगी।

इन तथ्यों के बावजूद सरकार ने राशन प्रणाली में आमूल सुधार करने पर बहुत जोर नहीं दिया है। प्रस्तावित विधेयक में राशन प्रणाली को सुधारने का जिम्मा राज्य सरकारों पर छोड़ दिया गया है। इससे खाद्य सुरक्षा विधेयक के रियायती अनाज में खुली लूट की आशंका है। इक्का-दुक्का राज्यों को छोड़कर बाकी राज्यों में राशन प्रणाली में भारी खामियां गिनाई गई हैं। संसद में सरकार के एक जवाब के मुताबिक पूर्वोत्तर राज्यों के राशन का पूरा अनाज खुले बाजार में बिकने के लिए पहुंच जाता है।

खाद्य सुरक्षा विधेयक में कुछ प्रावधान जरूर किया गया है, लेकिन इसके अमल को लेकर संदेह है। विधेयक के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों के जिन 75 फीसदी लोगों को रियायती अनाज देना है, उनमें से 46 फीसदी गरीबों को अनाज इसी पुरानी प्रणाली पर देने की व्यवस्था है। लेकिन 29 फीसदी सामान्य उपभोक्ताओं को रियायती अनाज देने के लिए राशन प्रणाली में सुधार जरूरी होगा। इसी तरह 50 फीसदी शहरी उपभोक्ताओं में 22 फीसदी सामान्य उपभोक्ताओं के लिए सुधार करना होगा। अफसोस! विधेयक में सुधार का जिम्मा राज्यों के ऊपर छोड़ दिया गया है।

सुधार के लिए राशन प्रणाली का कंप्यूटरीकरण, राशन कार्ड को ‘आधार’ से जोडऩे और कूपन व्यवस्था शुरू करने की व्यवस्था दी गई है। लेकिन राशन प्रणाली में सुधार के लिए वित्तीय मदद को लेकर प्रावधान में स्पष्ट निर्देश नहीं हैं। इसे लेकर केंद्र व राज्यों के बीच तकरार होनी तय है। शुक्र है कि ‘आधार’ को लेकर योजना आयोग और गृह मंत्रालय में छिड़ा शीतयुद्ध अब खत्म हो गया है।

*लेखक कोई हवा-हवाई नहीं, बल्कि जमीन से जुड़े हुए पत्रकार हैं। वे अपना एक ब्लॉग भी चलाते हैं।

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