दुर्गति में सद्गति!

।।संजय तिवारी।। दुनिया का तो पता नहीं लेकिन भारत में विचार के व्यापार का तरीका बड़ा वीभत्स हो गया है। जो व्यापार है उसमें विचारशून्यता अनिवार्य शर्त है लेकिन जहां विचार के प्रचार को ही व्यापार होना है वहां स्थिति बड़ी भयावह है। ज्ञान के बोझ को कांधे पर लादे भारत में विचारों का इतना अनादर आश्चर्य पैदा करता है। सत् तत्व को शब्द तक उतार लानेवाले भारतीय समाज में सद्विचार, सत्कर्म, सत्संग को समाप्त करने के जैसे बहुल प्रयास दिखाई देते हैं उसे देख सुन और समझकर संदेह पैदा होता है कि व्यक्तिगत या फिर समूहगत रूप से हम सद्गति कैसे प्राप्त कर सकेंगे?

सद्गति तो सबका अभीष्ट है। इंसान या फिर समाज के रूप में हमारी इच्छा सद्गति ही होती है। जैसे किसी व्यक्तित्व की पूर्ण अभिव्यक्ति उसके सद्गति अवस्था में होती है वैसे ही कोई समाज सद्गति को प्राप्त न हो तो उसमें रचनात्मकता का जन्म नहीं हो पाता। जन्म हो भी जाए तो दुर्गति को प्राप्त समाज उसका संरक्षण नहीं कर पाता है। हम सब सद्गति इच्छा में हैं। लेकिन अवस्था दुर्गति वाली है।

एक-एक व्यक्ति होते हुए पूरा समाज ही मानों प्रतिक्रियाग्रस्त हो चला है। समाज और व्यक्ति के रूप में हमारी क्रिया करने की शक्ति ही खत्म हो गयी है। हम एक अंतहीन प्रतिक्रिया का परिणाम होकर रह गए हैं। अगर किसी व्यक्ति का जीवन केवल प्रतिक्रिया हो जाए तो कल्पना कीजिए कि उसका स्वरूप और स्वभाव क्या होगा? ऐसे ही कोई समाज सिर्फ प्रतिक्रिया करे तो भला सत् तत्व को कैसे धारण कर सकेगा क्योंकि प्रतिक्रिया अपने आप में नकारात्मक होती है।

हमारा दुर्भाग्य है कि हम ऐसे ही सत् विहीन समाज के हिस्से होकर रह गए हैं। ऐसे सत् विहीन समाज की खोज भले ही सद्गति पाने की हो, लेकिन उसके सारे उपाय उसे दुर्गति से उबरने नहीं दे रहे हैं। विपरीत की इच्छा और विपरीत को प्राप्त होने के उपाय दोनों दो अलग बातें हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि हम दुर्गति को दूर करने की इच्छा रखते हैं लेकिन हमारे सारे उपाय दुर्गति में बने रहनेवाले हैं। शांति की खोज करनेवाले केवल शांति की इच्छा रखेंगे तो भला शांति कैसे मिलेगी? शांति प्राप्ति के लिए हमें उपाय करना होगा।

निजी तौर पर जो लोग सत् की उपासना में लगे हैं हम उन्हें भी संसार या दुनियादारी सिखाने लगते हैं। अगर वह संसार सीखने से मना कर दे तो हम सिर्फ इसलिए उसे नष्ट करने पर उतर आते हैं क्योंकि वह हमारी स्थापित मान्यताओं और धारणाओं के विपरीत जा रहा है।

ऐसा तो होना ही चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं है। जैसे ही इस समझ के साथ आप आगे बढ़ते हैं असार हो चुका संसार घेरा डाल देता है और तब तक डेरा डाले बैठा रहता है जब तक आप खुद असार न हो जाएं। कड़वी सच्चाई बोल रहा हूं। कोई सुनी सुनाई बात नहीं। कोई पढ़ी पढ़ाई कहानी नहीं। इसलिए बोल रहा हूं क्योंकि यही वह प्रक्रिया है जो किसी व्यक्ति को सिर्फ प्रतिक्रियाग्रस्त बनाकर छोड़ देती है। ऐसे प्रतिक्रियाग्रस्त लोगों का समाज सद्गति भला कैसे प्राप्त करेगा? और समाज ही दुर्गति में रहेगा तो हमारी सद्गति कैसे होगी?

शोर से उपजे सन्नाटे में इतना सोचने भर का मौका मिल जाए तो बात बननी शुरू हो जाएगी। कभी न कभी तो हमें यह सोचना होगा कि आज के व्यभिचारपूर्ण व्यापार के नियम विचार को आगे बढ़ाने में काम नहीं आएंगे।

(लेखक विचारों-समाचारों का झंझावाती पोर्टल विस्फोट चलाते हैं। यह लेख मूलतः वहीं (विस्फोठ डॉट कॉम)प्रकाशित एक लेख का संपादित अंश है)

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