रिजर्व बैंक ने दी बैंकों को उधार लेने की सुविधा

सिस्टम में तरलता की कमी का जरा-सा संकेत मिलते ही रिजर्व बैंक मैदान में उतर आया है। उसने तय किया है कि बैंक चल निधि समायोजन सुविधा (एलएएफ) के तहत कभी भी रिजर्व बैंक से अपनी कुल जमा का 0.5 फीसदी हिस्सा उधार ले सकते हैं। साथ ही एलएएफ सुविधा बैंकों को अब दिन में एक के बजाय दो बार दी जाएगी। रिजर्व बैंक का ताजा फैसला शुक्रवार 28 मई, 2010 से लागू हो जाएगा। लेकिन उसने स्पष्ट किया है कि यह सहूलियत तात्कालिक तौर पर दी जा रही है और इसे 2 जुलाई 2010 तक ही जारी रखा जाएगा।

बता दें कि 7 मई तक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक बैंकों की कुल जमा (नेट डिमांड एंट टाइम लायबिलिटी, एनडीटीएल – मोटे तौर पर बचत खातों व सावधि जमा में पडी रकम) 45,31,217 करोड़ रुपए थी। रिजर्व बैंक के नए फैसले का मतलब यह हुआ है कि बैंक उससे हर दिन 22,500 करोड़ रुपए रेपो दर पर उधार ले सकते हैं। रेपो की ब्याज दर अभी 5.25 फीसदी सालाना है।

रेपो के तहत बैंक सरकारी प्रतिभूतियां रिजर्व बैंक के पास रखकर रकम हासिल करते हैं। रिज्रर्व बैंक का कहना है कि अगर एलएएफ के तहत रकम लेने से बैंकों के एसएलआर (वैधानिक तरलता अनुपात) में कोई कमी आती है तो इसके लिए उनसे दंड स्वरूप कोई ब्याज नहीं लिया जाएगा। मोटे तौर पर एसएलआर वह अनुपात होता है जिसमें बैंकों को अपनी कुल जमा का हिस्सा सरकारी प्रतिभूतियों में हमेशा लगाए रखना होता है। इस समय एसएलआर की दर 25 फीसदी है। वैसे, एसएलआर प्रतिभूतियों में बैंकों का निवेश इस समय 30 फीसदी के ऊपर चल रहा है।

रिजर्व बैंक की तरफ से जारी सूचना में कहा गया है कि उसने इस साल की मौद्रिक नीति में कहा था कि ऋण की मांग के अनुरूप जब भी जरूरत होगी, अतिरिक्त तरलता उपलब्ध कराई जाएगी। इधर 3 जी की नीलामी के बाद कंपनियों की तरफ से ऋण की मांग बढ़ी है। साथ ही अग्रिम कर भुगतान के लिए भी अतिरिक्त धन की जरूरत है। इसी के मद्देनजर रिजर्व बैंक ने बैंकों को अतिरिक्त तरलता पाने की सुविधा देने का कदम उठाया है।

तरलता की कमी का संकेत इस बात से भी मिलता है कि पिछले कुछ दिनों में बैंकों द्वारा एलएएफ के तहत रिवर्स रेपो में जमा कराई जानेवाली रकम अचानक घट गई है। दस दिन पहले तक जहां यह राशि हर दिन 35,000 से 45,000 करोड़ रुपए हुआ करती थी, वहीं इस हफ्ते के पहले तीन दिनों में यह क्रमशः 4540 करोड़, 8890 करोड़ और 5685 करोड़ रुपए रह गई है। हालांकि यह भी तथ्य है कि बैंकों ने पिछले एक साल में शायद किसी भी दिन रिजर्व बैंक से रेपो के तहत रकम नहीं ली है।

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