ट्रेडिंग का एक स्टाइल: बहती गंगा में हाथ धोना, यानी हफ्ते-दस दिन के अल्कालिक चक्र में भाव जिस दिशा में चला हो, उसी दिशा में सौदे पकड़कर कमाई करना। लेकिन बीच में घुसने के नाते इसमें कमाई की रेंज कम होती है। दूसरे, रुख पलटा तो चपत का रिस्क तगड़ा रहता है। दूसरा स्टाइल: निश्चित अंतराल पर भाव जहां से रुख पलटते हैं, उस बिंदु को पकड़ना। इसमें रिस्क-रिवॉर्ड अनुपात ज्यादा रहता है। अब बुधवार का व्यवहार…औरऔर भी

अच्छी खबर से उम्मीद बढ़ती है और शेयर के भाव चढ़ जाते हैं। खासकर तब बेचनेवाले लगभग चुक गए हों। लेकिन दिक्कत यह है कि खबर हम से पहले पहुंचवालों तक पहुंच जाती है। लेकिन कभी-कभी ऐसा नहीं हो पाता। जैसे, गुरुवार को सुंद्रम फास्टेनर्स के अच्छे नतीजे आए तो बाज़ार बंद था। हमने इस मौके को पकड़ा। ट्रेडिंग की सलाह दी और वो शेयर शुक्रवार को एक दिन में 17.50% चढ़ गया। अब मंगलवार की नज़र…औरऔर भी

बाज़ार उठता है धीरे-धीरे। लेकिन गिरता है एकदम धूम-धड़ाम। ऐसा इसलिए क्योंकि कोई बुरी खबर आते ही हर कोई ठीक उसी वक्त बेचना चाहता है, बगैर यह सोचे कि उस खबर में सचमुच दम है या वो अफवाह तो नहीं। कालेधन वालों में प्रदीप बर्मन का नाम आया तो हर कोई डाबर बेचने लगा। लेकिन हमने कहा खरीदो, 10-12 दिन में 230 पर होगा। पांचवें ट्रेडिंग सत्र में ही 232 तक पहुंच गया। अब आगाज़ सोमवार का…औरऔर भी

मुनाफा कमाना हो तो रिस्क उठाने के बजाय हम पक्के, मगर कम रिटर्न पर संतोष कर लेते हैं। लेकिन घाटे की अवश्यसंभावी सूरत में भी उसे बचाने के लिए रिस्क उठाने को तत्पर रहते हैं। शास्त्रों तक में कहा गया है कि सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धम् त्यजति पंडितः अर्थात संपूर्ण का नाश होते देख आधे को त्याग दें। लेकिन हम घाटे को बचाने के चक्कर में रिस्क उठाकर सर्वनाश कर बैठते हैं। सोचिए, समझिए। अब ट्रेड शुक्रवार का…औरऔर भी

मन के हारे हार, मन के जीते जीत। बाज़ार में जीत का वास्ता ट्रेडिंग शैली से कहीं ज्यादा आपकी मानसिक बुनावट से है। 90% काम मानसिक हिसाब-किताब और तैयारी का। बस 10% काम उस पर अमल का होता है। कहा जाता है कि चार्ट पढ़ने से पहले यह समझना ज्यादा महत्वपूर्ण है कि लोगबाग कैसे सोचते हैं। डर से भागने, लालच में अंधे हो जाने जैसे सामूहिक मनोविज्ञान की बारीक समझ ज़रूरी है। अब बुद्धि बुधवार की…औरऔर भी

बिना कोई सेवा या सलाह लिए यूं ही कोई शेयर चुन लें। हो सकता है कि वो उस दिन छलांग लगा जाए और महंगी सेवा का शेयर लुढ़क जाए। आगे का किसी को पता नहीं। दरअसल, सारा किस्मत का खेल है क्योंकि किसी भी शेयर में खरीदने, बेचनेवालों के संतुलन का सटीक आकलन नामुमकिन है। पर किस्मत का मामला एकदम रिस्की है। अध्ययन-विश्लेषण से हम ट्रेडिंग में किस्मत का यही रिस्क साधते हैं। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

कुशल खिलाड़ी वही है जो सामनेवाले को अपने अगले दांव का भान न होने दे। वह अक्सर वो करता है जिसका सहज अनुमान लगाना मुश्किल हो। सो, बराबर वो अपनी चाल बदलता रहता है। इसी तरह शेयर बाज़ार के उस्ताद भी अपनी रणनीति बदलते रहते हैं। ट्रेडिंग में कमाई चूंकि उस्तादों व संस्थाओं की रणनीति को पकड़ने का खेल है। इसलिए हमें भी बराबर अपनी रणनीति को अपडेट करते रहना चाहिए। करते हैं अब शुक्र का वार…औरऔर भी

आंकड़े अतीत के। विश्वास कि अतीत खुद को भविष्य में दोहराएगा। फिर भविष्य का अनुमान। इसी से हम शेयर, कमोडिटी या विदेशी मुद्रा की भावी चाल का आकलन करते हैं। लेकिन जब वशिष्ट जैसे मुनि की गणना का हश्र यह हो कि सीता हरण, मरण दशरथ को, वन में विपति परी, तब औरों की क्या बिसात! सो, ट्रेडिंग में घाटा लगना अवश्यसंभावी है। यह इस धंधे की वर्किंग कैपिटल है, लागत है। परखें अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

एनएसई में हर दिन 1500 से ज्यादा कंपनियों में ट्रेडिंग होती है। इनमें से 135 कंपनियों में फ्यूचर्स व ऑप्शंस ट्रेडिंग की इजाजत है। सबसे बड़ी मुश्किल यह कि ट्रेडिंग के लिए चुनें किस-किस को चुनें? अलग-अलग उद्योग के स्टॉक्स का स्वभाव अलग और एक ही सेगमेंट के शेयरों तक की चाल अलग। चुनने के लिए उनके स्वभाव का पता लगाना होता है। स्वभाव जानने के लिए देखनी पड़ती है सालों-साल की चाल। अब बुधवार की दिशा…औरऔर भी

ट्रेडिंग करते वक्त भावनाओं पर नियंत्रण की बात बार-बार कही जाती है। इसकी एकमात्र वजह यह है कि भावनाओं में बहकर हम सच नहीं देख पाते। और, आप जानते ही हैं कि द्रोणाचार्य जैसा गुरु व महारथी भी भावनाओं में बहता है तो धृष्टद्युम्न जैसा सामान्य योद्धा तक उसे मार देता है। यह भी सच है कि घाटा लगते ही बड़े-बड़े धैर्यवान भावना में बह जाते हैं। इसीलिए बना है 2-6% का नियम। अब मंगलवार की मानसिकता…औरऔर भी