सोना गिरवी था, उत्ता सस्ता सेंसेक्स

एक बार फिर मैंने बाजार को जबरदस्त निराशा के आगोश में डूबा हुआ देखा। इतनी निराशा कि लोगों को केवल घाटी दिख रही है, ठीक वहीं से उठता पहाड़ नहीं दिख रहा। माना कि वैश्विक मसलों ने भारतीय बाजार को घेर रखा है और सेंसेक्स को 16,000 तक गिरा डाला है। लेकिन यह ऐसा स्तर है जहां से बहुतों को भारतीय शेयरों में कायदे का मूल्य नजर आ रहा है। यही वजह है कि आज निफ्टी में 1.10 फीसदी और 1.24 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई।

कमाल की बात यह है कि देश के सबसे बड़े अंग्रेजी आर्थिक अखबार इकनॉमिक टाइम्स ने महज दस फंड मैनेजरों व ब्रोकरों की रायशुमारी से बता डाला कि सेंसेक्स अभी 13 फीसदी और गिर सकता है। इतने छोटे सैम्पल को कभी भी आम धारणा का आधार नहीं माना जा सकता। इसके पीछे कौन-सी संपादकीय नीति काम कर रही थी, नहीं मालूम। लेकिन इसने निवेशकों के मिजाज पर तगड़ी चोट की है। अच्छे मूल्यांकन के मौजूदा स्तर खरीदने के बजाय निवेशक, खासकर रिटेल निवेशक अब बाजार में 20 फीसदी और गिरावट की बात करने लगे हैं। यह ऐसा तब है, जब बाजार ओवरसोल्ड अवस्था में है और सेटलमेंट के खत्म होने में बस तीन दिन बचे हैं। निफ्टी फिर से 4900 के करीब पहुंच चुका है। आज वह 4898.80 पर बंद हुआ।

उधर गद्दाफी के जाने के साथ ही लीबिया का मसला अंततः सुलझता हुआ दिख रहा है। इससे दुनिया में कच्चे तेल के उत्पादन का स्तर बढ़ जाएगा, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसके दाम घटेंगे जो उभरते बाजारों, खासकर भारत के लिए काफी सुखद रहेगा। यूरोप की आर्थिक व वित्तीय हालत खराब है और हाल-फिलहाल ऐसी ही रहेगी। लेकिन यह भारत के लिए बहुत सकारात्मक है। हो सकता है कि अमेरिका को क्यूई-3 थोड़ा पहले लाना पडे, हालांकि पहले माना जा रहा था कि वह ऐसा फरवरी 2012 में करेगा। इससे वहां की अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त नकदी आएगी जो बहकर उभरते बाजारों का ही रुख करेगी।

भारतीय शेयर बाजार का मूल्यांकन इस समय बेहद आकर्षक हो चला है। सेंसेक्स 16,341.70 पर बंद हुआ है। अगर सेंसेक्स के तीस में से दस स्टॉक्स को हटा दें तो उसका पी/ई 10 से भी नीचे पहुंच जाता है। ऐसा तो 1991 में भी नहीं हुआ था, जब भारत को 2.2 अरब डॉलर ऋण लेने के लिए अपना सोना अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के पास गिरवी रखना पड़ा था। आज हमारे पास 316.61 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है।

हम पिछले दो दिनों में दिल्ली के कुछ निवेशकों से मिले और उनसे हमने जानना चाहा कि क्या वे अब भी शेयर बाजार में पहले की तरह निवेश कर रहे हैं। पता चला कि उनकी पक्की धारणा है कि इस समय सरकारी नीतियों की शह पाकर मंदड़िए कुछ एफआईआई के साथ मिलकर गदर काटे हुए हैं। वे पूरी तरह कार्टेल की तरह काम कर रहे हैं। यह इससे पता चलता है कि जहां कुछ स्टॉक्स 30 से 50 के पी/ई पर ट्रेड होने के बावजूद चहक रहे हैं, वहीं कुछ स्टॉक्स 2 के पी/ई पर ट्रेड होने के बावजूद उठने का नाम नहीं ले रहे। इसकी बड़ी वजह स्टॉक डेरिवेटिव्स में फिजिकल सेटलमेंट का अभाव है। वे यह भी मानते हैं कि शेयरों को तत्काल ऐसा आस्ति वर्ग बनाने की जरूरत है जहां से हर महीने वैकल्पिक कमाई हो सके।

खैर, अगले तीन दिन बाजार के लिए बड़े नाजुक हैं क्योंकि उस्ताद लोगों की कोशिश रहेगी कि रिटेल और एचएनआई निवेशक कोई भी रोलओवर न कर सकें। वे इसी सेटलमेंट कैश मार्जिन वसूल कर उनकी मिट्टी पलीद करने की फिराक में हैं।

आप जिंदगी से जो भी चाहते हैं, उसे पाने का पहला कदम यह है कि आप तय करें कि आप ठीकठीक चाहते क्या हैं।

(चमत्कार चक्री एक अनाम शख्सियत है। वह बाजार की रग-रग से वाकिफ है। लेकिन फालतू के कानूनी लफड़ों में नहीं उलझना चाहता। सलाह देना उसका काम है। लेकिन निवेश का निर्णय पूरी तरह आपका होगा और चक्री या अर्थकाम किसी भी सूरत में इसके लिए जिम्मेदार नहीं होंगे। यह मूलत: सीएनआई रिसर्च का फीस-वाला कॉलम है, जिसे हम यहां मुफ्त में पेश कर रहे हैं)

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