नए बैंक लाइसेंस पर रिजर्व बैंक का बहस-पत्र

वित्त मंत्री ने इस साल 26 फरवरी को अपने बजट भाषण में नए बैंकों को लाइसेंस देने की बात कही थी, तभी से बाजार में कयास लगाए जाने लगे थे कि किस-किस कंपनी को बैंकिंग लाइसेंस मिल सकता है। इसके बाद रिजर्व बैंक ने 20 अप्रैल को सालाना मौद्रिक नीति में कहा कि वह जुलाई के अंत तक इस बारे में दिशानिर्देश जारी कर देगा। लेकिन जुलाई के बीत जाने के दस दिन बाद रिजर्व बैंक ने नए बैंकों को लाइसेंस देने के बारे दिशानिर्देश तो नहीं जारी किया। हां, 81 पेज का लंबा-चौड़ा बहस पत्र जरूर पेश कर दिया है जिसमें कहीं से भी यह पता नहीं चलता कि इस मसले पर सरकार या रिजर्व बैंक की क्या राय है।

इसके 48 पेज में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, यूरोपीय संघ, मलयेशिया, हांगकांग व जापान के अनुभव दिए गए हैं। बाकी 33 पेज में भारत के पुराने अनुभव, मौजूदा नियमों और बैंकों से जुड़े तमाम पहलुओं के फायदे-नुकसान गिनाए गए हैं। साथ में रिजर्व बैंक ने 1993 और 2001 में निजी क्षेत्र के बैंकों के लिए बनाए गए दिशानिर्देश भी नत्थी किए हैं। यह वाकई एक बहस पत्र ही है जो बैंकिंग के विद्यार्थियों के लिए काफी लाभप्रद हो सकता है। लेकिन बाजार के जो लोग इससे कोई संकेत पाना चाहते हैं, उन्हें कम से कम दो महीने और इंतजार करना होगा।

रिजर्व बैंक ने इस पर सभी लोगों ने 30 सितंबर तक प्रतिक्रिया मांगी है। बहस पत्र पर सारी प्रतिक्रियाओं, टिप्पणियों और सुझावों के मिलने के बाद इस मसले से जुड़े सभी पक्षों के साथ फिर व्यापक विचार-विमर्श किया जाएगा। सारे निष्कर्षों की समीक्षा विशेषज्ञों का एक बाहरी दल करेगा। उसी के बाद नए बैंकों के लाइसेंस के लिए दिशानिर्देश जारी होंगे और इस सिलसिले में आवेदन मंगाए जाएंगे। जाहिर-सी बात है कि पूरा अक्टूबर माह तो बहस-मुवाहिशे में ही निकल जाएगा। इसलिए 2 नवंबर को मौद्रिक नीति की दूसरी त्रैमासिक समीक्षा पेश करने से पहले इस मामले में कुछ नहीं होनेवाला है।

बहस पत्र में छह विशेष मुद्दों को केंद्र में रखा गया है। एक, नए बैंकों के लिए न्यूनतम पूंजी आवश्यकता क्या हो और उसमें प्रवर्तकों का कितना योगदान होना चाहिए। दो, प्रवर्तकों व अन्य शेयरधारकों की हिस्सेदारी की न्यूनतम व अधिकतम सीमा क्या हो। तीन, नए बैंकों में विदेशी शेयरधारिता क्या हो। चार, क्या औद्योगिक व बिजनेस घरानों को बैंक बनाने की अनुमति दी जानी चाहिए। पांच, क्या गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) को बैंक में बदलने या अलग से नया बैंक बनाने की अनुमति दी जानी चाहिए। और छह, नए बैंकों का बिजनेस मॉडल क्या होगा।

इसमें हर मुद्दे पर बहस-पत्र में पूरा इतिहास भूगोल और तर्कशास्त्र पेश किया गया है। हर संभावना के फायदे-नुकसान गिनाए गए हैं। इन्हें तफ्सील से पढ़ना किसी के लिए वाकई काफी दिलचस्प होगा। लेकिन बिजनेस मॉडल के बारे में एक बात काफी हद तक साफ कर दी गई है कि इसमें वित्तीय समावेशन का पहलू शामिल रखना होगा। सरकार की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि अभी तक देश की 40 फीसदी आबादी तक ही बैंकिंग सेवाएं पहुंच पाई हैं।

ब्रोकर फर्म एसएमसी कैपिटल के इक्विटी प्रमुख जगन्नाधम तुमगुंटला का कहना है कि बहस पत्र में तीन बातें काफी ध्यान देने की हैं। एक तो इसने साफ कर दिया है कि रीयल एस्टेट के धंधे से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ी किसी भी कंपनी को बैंकिंग लाइसेंस नहीं मिलेगा। दूसरे कि औद्योगिक घरानों को फिर से बैंकिंग में उतरने की इजाजत मिल सकती है। इसमें भी वित्तीय सेवाओं के अनुभव को तरजीह देने की बात कही गई है तो इसका लाभ रेलिगेयर, आईएफसीआई, आईएल एंड एफएस, रिलायंस कैपिटल, बजाज फिनसर्व और महिंद्रा एंड महिंद्रा फाइनेंस जैसी कंपनियों को मिल सकता है।

तीसरी अहम बात यह है कि विदेशी बैंक भारत में पहले दस साल तक अपने बैंक में 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी नहीं रख सकते। इससे भारतीय बैंकों को बड़े विदेशी बैंकों की प्रतिस्पर्धा से बचने में मदद मिलेगी। बता दें कि कल ही वित्त राज्य मंत्री नमो नारायण मीणा ने संसद में बताया था कि 18 विदेशी बैंक भारत में अपने शाखाएं या प्रतिनिधि कार्यालय खोलने के लिए रिजर्व बैंक के पास आवेदन भेज चुके हैं।

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