सरकार सीबीडीटी से फोन टैपिंग का अधिकार छीनने की पूरी तैयारी में

कैबिनेट सचिवालय ने फोन टैपिंग पर दी गई अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की है कि केंद्रीय प्रत्‍यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) को या तो टेलीफोन टैपिंग के लिए अधिकृत एजेंसियों की सूची से बाहर निकाल दिया जाए या विशेष परिस्थितियों में गृह सचिव की मंजूरी लेने के बाद ही उसे इसकी इजाजत दी जाए। सचिवालय ने स्पष्ट किया है कि कानून केवल कर चोरी का पता लगाने के लिए टेलीफोन टैपिंग और बातचीत की निगरानी करने की अनुमति नहीं देता। अघोषित संपत्ति और कर चोरी का पता लगाने के लिए पहले से ही विशिष्‍ट नियम और कानून हैं। बता दें कि सीबीडीटी को फोन टैपिंग का अधिकार केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने ही पहले वित्त मंत्री रहने के दौरान दिया था।

सबसे खास बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने व्याख्या दी है कि किसी सार्वजनिक आपातस्थिति या सार्वजनिक सुरक्षा के हित के लिए ही टेलिफोन टैपिंग की जा सकती है। इनमें से कोई भी गोपनीय शर्त नहीं है। यहां तक कि आर्थिक आपातकाल में भी ऐसी शर्त में शामिल नहीं है। कोर्ट का कहना है कि केवल आर्थिक आपातकाल जरूरी नहीं कि ‘सार्वजनिक आपातकाल’ जैसी हालत उत्‍पन्‍न करे। धारा 5 (2) के तहत की गई कार्रवाई को तब तक उचित नहीं ठहराया जाएगा, जब तक इस धारा में जिक्र की गई समस्‍या उत्‍पन्‍न न हो जाए।
कैबिनेट सचिवालय की रिपोर्ट मे कहा गया है कि कर चोरी कोई आपराधिक नहीं, बल्कि दीवानी मामला है। ऐसे में फोन टैपिंग की जरूरत ही नहीं है। समिति ने यह भी कहा है कि टैक्स चोरी के मामले में फोन टैपिंग को इसलिए भी जायज नहीं कहा जा सकता है क्योंकि किसी भी व्यक्ति को 30 फीसदी दंड लेकर उसे टैक्स चोरी के आरोप से बरी किया जा सकता है।

कैबिनेट सचिवालय ने मीडिया में आई तमाम खबरों के मद्देनजर स्पष्ट किया है कि टेलिफोन टैपिंग का मामला भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम, 1885 की धारा 5 (2) के साथ भारतीय टेलीग्राफ नियम, 1951 के तहत आता है। साथ ही सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69 के साथ सूचना प्रौद्योगिकी (सूचना पर पाबंदी या अनुश्रवण या डिकोड के अनुदेश) नियम, 2009 में भी यह समाहित हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने पीयूसीएल बनाम भारत संघ नामक मामले में कहा था कि अपने घर या कार्यालय से टेलीफोन पर अबाधित बातचीत करना ‘निजता का अधिकार’ है। इसी के अनुरूप टेलीफोन टैपिंग भारतीय संविधान द्वारा क्रमश: अनुच्‍छेद 21 और 19 (1) (क) के तहत प्रदत्त जीवन जीने के अधिकार और बोलने व अभिव्‍यक्ति के अधिकार का उल्‍लंघन है। यह उल्‍लंघन तब तक माना जाएगा जब तक कि नियम द्वारा स्‍थापित प्रक्रिया के तहत टैपिंग की अनुमति न दी जाए। कोर्ट ने आगे कहा कि भारतीय टेलिग्राफ अधिनियम की धारा 5 (2) साफ कहती है कि इन प्रावधानों के उपयोग के लिए ‘किसी सार्वजनिक आपातकाल की उपस्थिति’ या ‘सार्वजनिक सुरक्षा का हित’ जरूरी शर्त है।

सार्वजनिक आपातकाल का मतलब उस आकस्मिक स्थिति या हालात से है जो तत्‍काल प्रभाव से लोगों को बड़ी संख्‍या को प्रभावित करे। यह वो स्थिति है जब सार्वजनिक सुरक्षा, देश की संप्रभुता और एकता, राष्‍ट्र की सुरक्षा, संप्रभु देशों से मैत्री संबंध या सार्वजनिक आदेश से संबंधित समस्‍याएं उत्‍पन्‍न हो जाए। ‘सार्वजनिक सुरक्षा’ का तात्‍पर्य खतरे या जोखिम से बड़े पैमाने पर लोगों की सुरक्षा करना है।

कैबिनेट सचिवालय की इस रिपोर्ट को कॉरपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया के फोन की टैपिंग और उस पर टाटा समूह के मुखिया रतन टाटा द्वारा उठाई गई आपत्ति के मद्देनजर देखा जा रहा है। असल में खुद प्रधानमंत्री ने कैबिनेट सचिवालय को फोन टैपिंग के दुरुपयोग रोकने के लिए नियमों, प्रक्रियाओं और प्रणालियों पर विचार करने का निर्देश दिया था। इसके बाद ही कैबिनेट सचिवालय ने अपनी रिपोर्ट तैयार की है। हालांकि उसने अपनी सफाई में कहा कि उसकी सिफारिशों को निजी या हित समूहों के संघर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

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