मुबारक़ हो गणतंत्र, किस का है कैसा हो!

भारतीय गणतंत्र 73 साल का हो गया। देश के सभी समझदार व संवेदनशील नागरिकों को परखने की ज़रूरत है कि अब तक नियमित अंतराल पर बराबर चुनावों से गुजरता हमारा लोकतंत्र सत्ता तंत्र के मजबूत होते जाने का सबब बना है या सचमुच भारतीय लोक या गण शक्तिमान बना है। हमें यह भी देखना चाहिए कि प्राचीन भारत में गणतंत्र का क्या स्वरूप था, आज कैसा है और कैसा होना चाहिए। इन मसलों पर संक्षिप्त चर्चा करने से पहले बता दूं कि स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलों के चलते मैं ‘तथास्तु’ और ‘ट्रेडिंग बुद्ध’ का कॉलम कुछ दिन तक नहीं लिख पाऊंगा। तथास्तु का अगला कॉलम 5 फरवरी और ट्रेडिंग बुद्ध का अगला कॉलम 6 फरवरी को आएगा। इस बीच बजट का अहम सप्ताह गुजर जाएगा। वैसे भी इस दौरान खबरों का जोर रहता है और नियमतः रिटेल ट्रेडरों को बाज़ार से दूर रहना चाहिए। अब डालते हैं प्राचीन भारत के गणतंत्र पर एक नज़र…

कहा जाता है कि गणराज्यों की परम्परा यूनान के नगर राज्यों से प्रारंभ हुई थी। लेकिन इन नगर राज्यों से भी हजारों साल पहले भारत में अनेक गणराज्य स्थापित हो चुके थे। उनकी शासन व्यवस्था अत्यंत दृढ़ थी और जनता की आवाज़ राजा तक बराबर पहुंचती थी। लेकिन गणतंत्र का वह स्वरूप नहीं था जो आज के आधुनिक दौर में है। हालांकि गण और संघ जैसे शब्द भारत में आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पहले ही प्रयोग होने लगे थे। महाभारत के शांतिपर्व में राजकाज में बहुत से प्रजाजनों की भागीदारी का उल्लेख मिलता है जो उस समय समाज में गणतंत्र के प्रति बढ़ते आकर्षण का संकेत देता है।

नए गणतंत्रों की स्थापना का काम भारत के किसी एक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं था, बल्कि उसका असर पूरे देश में स्थान-स्थान पर नजर आता था। आगे चलकर यूनानी राजदूत मेगास्थनीज ने भी क्षुदक, मालव और शिवि जैसे गणराज्यों का वर्णन किया। राजा का शाब्दिक अर्थ (जनता का) रंजन करने वाले या सुख पहुंचाने वाले से है। हमारे यहां राजा की शक्तियां सदैव सीमित हुआ करती थीं। गणराज्य में तो अंतिम शक्ति स्पष्ट रूप से जनसभा या स्वयं जनता के पास होती थी। लेकिन राजतंत्र में भी निरंकुश राजा को स्वीकार नहीं किया जाता था। जनमत की अवहेलना एक गंभीर अपराध था, जिसके दंड से स्वयं राजा या राजवंश भी नहीं बच सकता था। महाभारत के अनुशासन पर्व में साफ कहा गया कि जो राजा जनता की रक्षा करने का अपना कर्तत्व पूरा नहीं करता, वह पागल कुत्ते की तरह मार देने योग्य है।

दरअसल, प्राचीन भारत में गणतंत्र कुछ कुलीन लोगों का समूह होता था। ये लोग सामूहिक रूप से सम्पूर्ण कबीले पर शासन करते थे। इनमें से प्रत्येक कबीलाई कुलीन को राजा कहा जाता था। प्रत्येक राजा के पास अपने सेनापति एवं सेनाएँ होती थीं। गणतंत्र व्यवस्था में शासन से सम्बन्धित निर्णय सभी राजा मिलकर लेते थे। उनकी नियमित बैठकों व आपसी बहस के लिए अलग से भवन बनाया जाता था जिसे संथागार कहते थे। हमारा संसद शब्द संभवतः वहीं से निकला है।

महात्मा बुद्ध के समय में मूल रूप से 10 गणतंत्र थे। ये गणतंत्र अपने-अपने कबीलों पर शासन करते थे। ये गणतंत्र हैं – 1. कपिलवस्तु के शाक्य, 2. वैशाली के लिच्छवि, 3. अलकप्प के बुली, 4. केसपुत्त के कलाम, 5. रामग्राम के कोलिय, 6. कुशीनारा के मल्ल, 7. पावा के मल्ल, 8. पिप्पलिवन के मोरिय, 9. सुमसुमारा के भग्ग और 10. मिथिला के विदेह।

कपिलवस्तु के शाक्य: इस गणतन्त्र के प्रमुख नगर कपिलवस्तु, चातुमा, खोमदुस्स, सिलावती, नगरक, देवदह आदि थे। इनमें से कपिलवस्तु इस गणतंत्र की राजधानी थी। इसे शाक्यवंशीय सुकीर्ति ने बनवाया था। शाक्य गणतंत्र के लोग अपनी जाति के बाहर की कन्याओं से विवाह नहीं करते थे। वे केवल अपनी जाति की कन्याओं से विवाह करते थे। महात्मा बुद्ध इसी गणतन्त्र से सम्बन्धित थे।

वैशाली के लिच्छवि: महात्मा बुद्ध के समय का यह सबसे बड़ा और शक्तिशाली गणतन्त्र था। लिच्छवि वज्जिसंघ में सर्वप्रमुख था। इस गणतन्त्र की राजधानी वैशाली थी। यह बिहार के वर्तमान मुज़फ्फरपुर जिले के बसाढ़ नामक स्थान पर अवस्थित थी। ‘महावग्ग जातक’ की कथा के अनुसार वैशाली एक धनी, समृद्ध और घनी आबादी वाला नगर था। लिच्छवि का प्रसिद्ध राजा चेटक था। इसकी पुत्री चेलना (छलना) का विवाह मगध के राजा बिम्बिसार के साथ हुआ था। इसके अलावा राजा चेटक की बहन त्रिशला का विवाह वज्जि संघ के ज्ञातृक कुल के प्रधान सिद्धार्थ के साथ हुआ था। इन्हीं सिद्धार्थ और त्रिशला के पुत्र वर्धमान महावीर थे। लिच्छवि गणतन्त्र के लोगों ने महात्मा बुद्ध के निवास के लिए एक कूटाग्रशाला का निर्माण करवाया था। इस कूटाग्रशाला में रहकर महात्मा बुद्ध ने समाज के लोगों को उपदेश दिए थे।

अलकप्प के बुली: इस गणतन्त्र की राजधानी बेतिया थी। इस गणतन्त्र के लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। बुली गणतन्त्र वर्तमान बिहार राज्य के शाहाबाद, आरा और मुज़फ्फरपुर जिलों के मध्य अवस्थित था।

केसपुत्त के कलाम: पालि ग्रन्थों के अनुसार केसपुत्त के कलामों का सम्बन्ध पांचाल जनपद के ‘केशियों’ के साथ था। महात्मा बुद्ध के गुरु आचार्य अलार कलाम इस गणतन्त्र से सम्बन्धित थे। महात्मा बुद्ध ने उनसे सांख्य दर्शन की दीक्षा प्राप्त की थी।

रामग्राम के कोलिय: इस गणतंत्र की राजधानी रामग्राम वर्तमान गोरखपुर जिले के रामगढ़ ताल में अवस्थित थी। इस गणतन्त्र के लोग अपनी पुलिस शक्ति के लिए प्रसिद्ध थे।

कुशीनारा के मल्ल: वाल्मीकि रामायण में कुशीनारा के मल्लों को श्री राम के छोटे भाई लक्ष्मण के पुत्र चन्द्रकेतुमल्ल का वंशज कहा गया है।

पावा के मल्ल: यह गणतन्त्र वर्तमान कुशीनगर जिले के पडरौना नामक स्थान पर अवस्थित था। इस गणतन्त्र के लोग सैनिक प्रवृत्ति के थे।

पिप्पलिवन के मोरिय: मोरों के प्रदेश के निवासी होने के कारण इस गणतन्त्र के लोगों को ‘मोरिय’ कहा गया था। मोरिय शब्द से ‘मौर्य’ शब्द उत्पन्न हुआ है। मगध के सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य इसी वंश से सम्बन्धित थे।

सुमसुमारा के भग्ग: सुमसुमारा के भग्ग ऐतरेय ब्राह्मण में वर्णित ‘भर्ग वंश’ से सम्बन्धित थे। यह गणतंत्र वर्तमान मिर्ज़ापुर जिले की चुनार में अवस्थित था।

मिथिला के विदेह: इस गणतंत्र के राजा जनक थे। वे अपनी शक्ति और दार्शनिक ज्ञान के लिए प्रसिद्ध थे। इस गणतंत्र की राजधानी मिथिला वर्तमान जनकपुर में स्थित थी।

2 Comments

  1. Dear Sirji

    GET WELL SOON

  2. Author

    Thank you Prasadji.

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