कंपनियों, बीमा व फंडों का नापाक खेल

जो बात अभी तक शेयर बाजार से ताल्लुक रखनेवाला हर कोई शख्स दबी जुबान से कहता रहा है, वह अब भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनर डॉ. वाई वी रेड्डी की जुबान पर आ गई है। उनका कहना है कि शेयर बाजार में कॉरपोरेट क्षेत्र, म्यूचुअल फंड, बीमा कंपनियों और गैर-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों (एनबीएफसी) के बीच जिस तरह के रिश्ते हैं, वैसे में ये बाजार के साथ खेल करते होंगे, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। कम से कम इसका संदेह तो जरूर है। इस संदेह को दूर करने के लिए बाजार नियामक संस्थाओं (सेबी या रिजर्व बैंक) की तरफ से व्यापक अध्ययन कराए जाने की जरूरत है।

बता दें कि डॉ. रेड्डी वो शख्सियत हैं जो 2003 से 2008 में वैश्विक वित्तीय संकट शुरू होने के ठीक पहले तक रिजर्व बैंक के गवर्नर थे और उनकी बनाई नीतियों की वजह से ही माना जाता है कि भारत इस वैश्विक संकट की फांस से बचा रह गया। उन्होंने सोमवार को अपनी नई किताब ‘ग्लोबल क्राइसिस, रिसेशन एंड अनइवेन रिकवरी’ के विमोचन के दौरान मीडिया के बातचीत में माइक्रो फाइनेंस से लेकर पूंजी बाजार के हालात तक पर अपने बेबाक विचार रखे।

प्रमुख अंग्रेजी अखबार – द इंडियन एक्सप्रेस को दिए गए विशेष इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि ‘हितो के टकराव’ की आशंका को देखते हुए कॉरपोरेट क्षेत्र, म्यूचुअल फंड, बीमा कंपनियों और एनबीएफसी के आपसी रिश्तों का अध्ययन किया जाना चाहिए। उनके बीच ‘फायर वॉल्स’ हो सकती हैं, लेकिन उनके कामकाज व अंतर्संबंधों के व्यापक अध्ययन से यह विश्वास जमाने में मदद मिलेगी कि उनके हितों के मेल व टकराव से गंभीर व्यवस्थागत समस्या नहीं पैदा होगी।

डॉ. रेड्डी ने कहा, “ये सभी स्टॉक मार्केट में सक्रिय है। इन सभी को कॉरपोरेट क्षेत्र ने ही बनाया या स्पांसर किया हुआ है। आपको इस पहलू को सावधानी से देखना होगा क्योंकि यह बाजार के कामकाज के प्रति लोगों के विश्वास पर चोट करता है। …छोटे निवेशकों की सेवा करने के लक्ष्य के विपरीत भारत में कॉरपोरेट्स, एनबीएफसी और बैंकों को म्यूचुअल फंडों में निवेश की इजाजत मिली हुई है और उन्हें इस निवेश पर टैक्स की रियायत भी मिलती है।”

जब उनसे पूछा गया कि क्या ये सब मिलकर बाजार को अपने हित में नचाते हैं तो डॉ. रेड्डी का कहना था, “कम से कम इसका संदेह तो है ही। हो सकता है कि वे ऐसा न कर रहे हों। नियामकों को इस मसले पर गौर करना चाहिए। मैं इस पर एक स्टडी का सुझाव देता हूं।” उन्होंने कहा, चूंकि म्यूचुअल फंडों को संस्थाओं से रकम जुटाने की सुविधा मिली हुई है, इसलिए उनका प्रबंधन शायद व्यक्तिगत रिटेल निवेशकों के हितों की कीमत पर इन बड़ी संस्थाओं के प्रति ज्यादा समर्पित रहता है।

रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनर डॉ. रेड्डी ने माइक्रो फाइनेंस संस्थाओं को सूदखोरों की तरह काम करनेवाला बताया। उन्होंने सुझाव दिया कि जिस तरह देश के बैंक लाभ कमानेवाली माइक्रो फाइनेंस संस्थाओं को उधार व सहयोग दे रहे हैं, इस मसले का भी अध्ययन किया जाना चाहिए। उन्होंने एक अन्य इंटरव्यू में तो माइक्रो फाइनेंस को भारत की अमेरिका के सब-प्राइम जैसी समस्या बता दी। उनका कहना था कि यह अंततः सब-प्राइम लेंडिंग जैसा ही कुछ है। उसी तरह के प्रोत्साहन यहां भी हैं। अमेरिका में सिक्यूरिटाइजेशन और डेरिवेटिव्स का खेल हुआ तो भारत में बैंकों की प्राथमिक क्षेत्र ऋण वितरण की जरूरत से इसका वास्ता है।

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