पार्टियों के अनाम चंदे में छिपा खेल कालेधन का

जिस देश के तीन-चौथाई से ज्यादा लोग दिन में 50 रुपए से कम में गुजारा करते हों, वहां की केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल में अगर तीन-चौथाई से ज्यादा मंत्री करोड़पति हों तो एक बात तो साफ है कि यह सरकार सही मायनों में बहुमत का प्रतिनिधित्व नहीं करती। सवाल यह भी है कि केंद्र की कांग्रेस लेकर, उत्तर प्रदेश की बीएसपी, तमिलनाडु की एआईडीएके और गुजरात की बीजेपी में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है तो ये पार्टियां देश के लोकतंत्र की हिफाजत कैसे कर सकती हैं, उसे कैसे आगे बढ़ा सकती हैं?

अभी हाल ही में यह भी पता चला है कि इन पार्टियों के खातों में घपला बहुत है तो ये पार्टियां देश में हो रहे घपलों की रोकथाम कैसे सकती हैं? एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिव राइट्स (एडीआर) के एक ताजा अध्ययन से सामने आया है कि हमारी राजनीतिक पार्टियां ज्यादातर धन गुमनाम स्रोतों से हासिल कर रही हैं। हमारा जन प्रतिनिधित्व कानून कहता है कि राजनीतिक पार्टियों को उन्हीं लोगों या कंपनियों का नाम बताने की जरूरत है जिन्होंने 20,000 रुपए से ज्यादा का सहयोग दिया हो। इस कानूनी नुक्ते का फायदा उठाकर राजनीतिक पार्टियां अधिकांश धन के स्रोत को प्रति व्यक्ति 20,000 रुपए से कम मिले चंदे के रूप में दिखाकर अपने खातों को काली चादर में छिपा ले जाती हैं। समस्या यह है कि आयकर विभाग को भी इसमें कुछ गलत नहीं लगता।

एडीआर ने देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों द्वारा 2008-09 तक के पांच सालों में दाखिल आयकर रिटर्न के आधार पर सारा कच्चा-चिट्ठा खोला है। इस अवधि में कांग्रेस ने कम से कम 978 करोड़ रुपए का चंदा जुटाया है, जबकि इसमें से केवल 85 करोड़ रुपए या 8.69 फीसदी धन के स्रोत का ही उसने खुलासा किया है।

अफसरों और टिकट पानेवाले विधायकों से करोड़ों लेने के लिए बदमान बहन मायावती की पार्टी ने महज दो सालों, 2007-08 और 2008-09 में 202.94 करोड़ रुपए का नकद चंदा हासिल किया। इसमें से चंदा देनेवाले एक भी आदमी के नाम का खुलासा उसने नहीं किया है क्योंकि उसका कहना है कि हर चंदे की रकम 20,000 रुपए से कम है। उसका दावा है कि लाखों गरीब दलित लोग ही उसे चंदा देते हैं जिनके नाम बताना न तो जरूरी है और न ही व्यवहार्य।

बीजेपी ने 2007-08 और 2008-09 में 297.7 करोड़ रुपए चंदे या सहयोग राशि से हासिल किए। उसने 2007-08 में उन 197 लोगों के नाम बताए हैं जिनसे उन्हें 24.96 करोड़ (101.43 करोड़ के कुल चंदे का 20 फीसदी) चंदा मिला था। इसी तरह 2008-09 में 196.27 करोड़ के चंदे में से 30.91 करोड़ (14 फीसदी) 173 लोगों ने दिए थे। पार्टी का दावा है कि इन लोगों ने 20,000 रुपए से ज्यादा का चंदा दिया था तो इनका नाम आ गया। बाकी 80 फीसदी से ज्यादा लोगों ने इससे कम चंदा दिया था तो उनका नाम बताना जरूरी नहीं है।

वैसे, अगर 20,000 हजार के ज्यादा चंदा देनेवालों के अनुपात को आधार बनाएं तो लालू की आरजेडी जनता से सबसे ज्यादा कटी हुई पार्टी है क्योंकि उसे 2008-09 में 25 फीसदी चंदा इसी तरह से मिला था। शरद पवार की एनसीपी 2008-09 में जनता से बीजेपी जितनी ही कटी हुई थी क्योंकि उसे 14 फीसदी चंदा अमीरों से मिला था। लेकिन एडीआर के को-ऑर्डिनेटर अनिल बैरवाल का कहना है कि यह सब आखों में धूल धोंकने जैसी बात है। आयकर विभाग ने 2006 से 2008 तक के दो आकलन वर्षों में कांग्रेस, बीजेपी, बीएसपी और सीपीएम द्वारा दाखिल रिटर्न की पड़ताल की है और उसे कोई गड़बड़ नहीं मिली है। लेकिन एडीआर ने केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) को पत्र लिखकर मांग की है कि सभी राजनीतिक पार्टियों के चंदों के अघोषित स्रोतों की जांच होनी चाहिए क्योंकि आमतौर पर किसी भी साल उनके कुल चंदे का 90 फीसदी ऐसे ही अनाम स्रोतों से आता है।

बैरवाल का कहना है कि राजनीतिक पार्टियों के खजाने में कालेधन के प्रवाह को रोकने के लिए इन्हें इस तरह नकद मिलनेवाले चंदे के स्रोत की जांच करना जरूरी है। होता यह है कि जन-प्रतिनिधित्व कानून का फायदा उठाते हुए पार्टियां एक ही आदमी से कई-कई नामों में 20-20 हजार का चंदा ले लेती हैं। इससे पार्टी पर कालेधन वाले का राजनीतिक ‘उपकार’ बन जाता है और उसका धन भी सफेद बन जाता है। एडीआर की मांग है कि हर पार्टी के लिए चंदा देनेवाले के नाम व पते का खुलासा करना कानूनन अनिवार्य बना देना चाहिए।

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