भागती कंपनी की डीलिस्टिंग ही भली

बाजार में भयंकर निराशा का आलम है। निफ्टी 5400 से भी नीचे जा चुका है। विदेशी निवेशकों की तरफ से डंका बजाया जा रहा है कि अगर यह 5300 के नीचे चला गया तो फिर इसे 4700 तक गिरने से रोक पाना मुश्किल होगा। लेकिन इस निराशा के बीच भी आम निवेशकों के लिए नोट बनाने का एक सुनहरा पक्ष उभर रहा है। अभी तक चार बहुराष्ट्रीय कंपनियां डीलिस्टिंग की घोषणा कर चुकी हैं। फिर भी वे स्टॉक एक्सचेंजों से अपने शेयर बाहर निकालने में सफल नहीं हुईं। इसका सीधा-सा कारण यह है कि उनके शेयरों की अच्छी-खासी मात्रा ऐसे लोगों के पास है जो पर्याप्त प्रीमियम मिले बगैर इन्हें बेचने को तैयार नहीं हैं।

ऐसी 20 से ज्यादा कंपनियां हैं जिनमें या तो प्रवर्तक अपनी इक्विटी हिस्सेदारी कम कर रहे हैं या उनको डी-लिस्ट कराने की योजना है। ऐसा भारत सरकार की तरफ से जारी उस नियम के चलते हो रहा है जिसके मुताबिक जिस किसी भी कंपनी में प्रवर्तकों की इक्विटी हिस्सेदारी अगर 75 फीसदी से ज्यादा है तो उन्हें इसे घटाना पड़ेगा ताकि पब्लिक के पास कम से कम 25 फीसदी शेयर हों। अन्यथा, कंपनी को डी-लिस्ट कराना पड़ेगा। ऐसा करने की अंतिम तिथि मार्च 2012 या उसके आसपास है। इसका मतलब यह हुआ कि कंपनियों के पास ऐसा करने के लिए 9 से 12 महीने ही बचे हैं।

1970 में कोकाकोला को एमआरटीपी एक्ट का पहला झटका लगा था और उसे देश छोड़कर जाना पड़ा था। अब बहुत-सी बहुराष्ट्रीय कंपनियां (एमएनसी) अपने शेयरों को यहां से डी-लिस्ट करानी चाहती हैं क्योंकि उनकी नीति है कि उनके शेयर केवल उनके गृह-देश में ही लिस्टेड होंगे। प्रॉक्टर एंड गैम्बल ने 100 फीसदी कंपनी को अनलिस्टेड ज़ोन में डालने जैसी हर तरह की पैंतरेबाजी कर डाली ताकि निवेशक थककर कंपनी में अपनी हिस्सेदारी बेच डालें और उसके पास कंपनी के कुल 90 फीसदी से ज्यादा शेयर आ जाए जिससे उसे वैधानिक रूप से इन्हें डी-लिस्ट कराने का मौका मिल जाए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और प्रवर्तकों की हिस्सेदारी 70.64 फीसदी पर अटकी हुई है।

इस समय बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामने कमजोर विकल्प यह है कि वे 12-13 फीसदी हिस्सेदारी बेचकर प्रवर्तकों की इक्विटी 75 फीसदी पर ले आएं और मजबूत विकल्प यह है कि वे खुले बाजार से 2-3 फीसदी शेयर खरीदकर 90 फीसदी की सीमा पकड़ लें। वे शायद दूसरे विकल्प पर अमल करेंगी क्योंकि भारत में लिस्टेड कंपनियों की शर्तों को पूरा करना उनके लिए काफी मुश्किल बन गया है।

एटलस कॉप्को और सुल्जर डी-लिस्टिंग कर चुकी हैं, जबकि बीओसी इंडिया और सेंट गोबैन इसकी घोषणा कर चुकी है, लेकिन इसे पूरा नहीं कर सकी हैं। नोवार्टिस, गुडईयर, क्लैरिएंट केमिकल्स, फेयरफील्ड एटलस, अल्फा लावेल, गिलेट, केन्नामेटल, प्रॉक्टर एंड गैम्बल, इनेवोस एबीएस, हनीवेल, ब्लू डार्ट, ओरैकल, एलैंटास बेक, शार्प, 3एम इंडिया और फोसेको इंडिया कुछ अन्य कंपनियां हैं जो खुद को डी-लिस्ट कराने की पुरजोक कोशिश में लगी हैं। इनमें से मुझे लगता है कि गुडईयर, क्लैरिएंट केमिकल्स और फेयरफील्ड एटलस जल्दी ही डीलिस्टिंग की घोषणा कर सकती हैं।

आज के बाजार में आपको ऐसे स्टॉक्स की दरकार है जिनमें कुछ खदक रहा हो, जहां कुछ ट्रिगर हो। जैसे, रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआईएल) दूरगामी निवेश के लिए बहुत ही अच्छा स्टॉक है। लेकिन कुछ स्पष्ट वजहों से बाजार उसे भाव नहीं दे रहा है। दूसरी तरफ बाजार वीआईपी इंडस्ट्रीज को हाथोंहाथ ले रहा है जबकि वह बुक वैल्यू से 12 गुने भाव पर ट्रेड हो रहा है। इसकी वजह है कि इसके इक्विटी चंद हाथों में बंधी है और इसके पीछे कुछ निहित स्वार्थ काम कर रहे हैं। नहीं तो हांगकांग में लिस्टिंग के बाद सैम्सोलाइट के 10 फीसदी गिर जाने के बाद जरूर इसमें गिरावट आ गई होती। आज यह गिरा तो सही, लेकिन महज 1.22 फीसदी।

चौंकानेवाली बात यह है कि सैम्सोलाइट में इतनी गिरावट तब आई है जब उसकी लिस्टिंग प्राइस-बैंड के निचले स्तर 14.3 डॉलर पर हुई थी। लेकिन वह इससे भी करीब 10 फीसदी 13 डॉलर पर जा पहुंचा। आर्थिक सुस्ती इस सेक्टर पर बुरा असर डालेगी। इसलिए निवेशकों को वीआईपी इंडस्ट्रीज से निकलकर क्लैरिएंट केमिकल्स की तरफ बढ़ जाना चाहिए। इस वक्त इससे बेहतर ‘स्विच’ कोई दूसरा हो नहीं सकता।

अंदर की ताकत से बड़ा हिफाजत का कोई इंतजाम हो नहीं सकता और अंदर की ताकत आती है शिक्षा से।

(चमत्कार चक्री एक अनाम शख्सियत है। वह बाजार की रग-रग से वाकिफ है। लेकिन फालतू के कानूनी लफड़ों में नहीं उलझना चाहता। सलाह देना उसका काम है। लेकिन निवेश का निर्णय पूरी तरह आपका होगा और चक्री या अर्थकाम किसी भी सूरत में इसके लिए जिम्मेदार नहीं होंगे। यह मूलत: सीएनआई रिसर्च का फीस-वाला कॉलम है, जिसे हम यहां मुफ्त में पेश कर रहे हैं)

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