श्रम से ब्रह्म-ब्रह्मांड

काम ही राम है। केवल चार शब्दों की इस नन्हीं मुन्हीं कहावत में प्रागैतिहासिक युग से भी बहुत पहले की झांकी मिल जाती है कि किसी ईश्वरीय चमत्कार से मनुष्य मनुष्य नहीं बना बल्कि वह मेहनत और काम का ही करिश्मा है कि उसने मनुष्य के अगले दो पांवों को हाथों में तब्दील कर दिया अन्यथा वह अब तक चौपाया का ही जीवन जीता। पांवों का स्थान छोड़कर हाथ स्वतंत्र हुए तो पत्थर फैंकना, लकडी थामना और पत्थरों के औजार व हथियार बनाने में मनुष्य कामयाब हो गया। कमर सीधी होते ही वह सीना तान कर आकाश की ओर सिर उठाए सीधा खडा हो गया तो प्रकृति ने भी उसके अदम्य पौरुष में मां की तरह हाथ बंटाना शुरू कर दिया। और, जब मेहनत या काम ने वाणी का अविष्कार किया तो उसकी कल्पना में अनेक देवताओं का अवतरण हुआ – इंद्र, वरुण, सूर्य आदि-आदि। मनुष्य की मेहनत ही वह आद्यशक्ति है, जिस से ब्रह्म और ब्रह्मांड का रहस्य उद्घाटित हुआ।

लेखक: विजयदान देथा (साभार: ज्ञान दर्पण)

1 Comment

  1. wah !!! gyan ghol ke pila dete ho . gyan ko sahaj bhav se samjhana hi vastvik kala h jo aaplogo mai dekh raha hu . kathin se kathin vishay itna sahaj prashansha ke kabil h .

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