एम्फैसिस को मिटाने में लगी एचपी!

एम्फैसिस बड़ी ठसक वाली कंपनी है। नाम तक सीधे नहीं लिखती। खुद को MphasiS लिखती है। लेकिन नाम से क्या! हमें तो काम से मतलब है। मुख्यतः बीपीओ (बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग) और रिमोट इंफ्रास्ट्रक्चर मैनेजमेंट या इंफ्रास्ट्रक्चर टेक्नोलॉजी आउटसोर्सिंग (आईटीओ) सेवाओं सक्रिय है। दुनिया के 14 देशों में 29 ऑफिस हैं। धंधा अच्छा करती है। लेकिन उसका वक्त अभी अच्छा नहीं चल रहा है। पिछले कुछ महीनों से एडेलवाइस जैसी देशी और सीएलएसए जैसी विदेशी निवेश फर्में उसकी नकारात्मक तस्वीर पेश करने में लगी हैं।

एडेलवाइस नवबंर से लेकर अब तक तीन रिसर्च रिपोर्टों में इसकी फजीहत कर चुकी है। सीएलएसए ने हाल की अपनी रिपोर्ट में कहा है कि एम्फैसिस में संचालन का स्तर एकदम गिर चुका है और उसका वित्तीय कामकाज इससे सीधे प्रभावित होगा। चंद महीनों में ही एम्फैसिस का शेयर (बीएसई – 526299, एनएसई – MPHASIS) आधा कट चुका है। इस साल 21 जनवरी को 711.90 रुपए के एक छोर पर था और 1 मार्च को 355 रुपए के दूसरे छोर पर पहुंच गया। 50 फीसदी से ज्यादा का झटका! अब भी 449.50 रुपए के आसपास चल रहा है।

असल में इसकी दुर्दशा का बड़ा रिश्ता मशहूर कंप्यूटर कंपनी हेवलेट पैकार्ड (एचपी) से जुड़ा हुआ है। एम्फैसिस पहले स्वतंत्र और अधिग्रहण के जरिए बढ़नेवाली कंपनी हुआ करती थी। मार्च 2005 में उसने अमेरिका की कंपनी एलडोराडो कंप्यूटिंग का अधिग्रहण किया था। अप्रैल 2006 में वह इलेक्ट्रॉनिक डाटा सिस्टम्स कॉरपोरेशन (ईडीएस) का हिस्सा बन गई। लेकिन मई 2008 में एचपी ने ईडीएस को खरीद लिया तो एम्फैसिस एचपी की कंपनी बन गई।

इस समय एचपी एम्फैसिस की सेवाओं की बड़ी ग्राहक है और उसकी बड़ी शेयरधारक और इकलौती व विदेशी प्रवर्तक भी। कंपनी की 209.97 करोड़ रुपए की इक्विटी में 60.53 फीसदी हिस्सा ईडीएस के जरिए एचपी का है। पब्लिक के हिस्से में 39.46 फीसदी शेयर हैं जिसमें से एफआईआई के पास 19 फीसदी और डीआईआई के पास 6.76 फीसदी शेयर हैं। दिसंबर से मार्च की तिमाही में एफआईआई ने अपनी हिस्सेदारी 1.02 फीसदी बढ़ाई है, जबकि डीआईआई ने 1.27 फीसदी घटाई है। हालांकि इस दौरान कंपनी का शेयर धक्के का शिकार हुआ है।

एचपी की तरह एम्फैसिस का वित्त वर्ष भी नवंबर से अक्टूबर तक का है। कंपनी ने 31 अक्टूबर 2010 को समाप्त वित्त वर्ष 2009-10 में 5036.52 करोड़ रुपए की समेकित आय पर 1090.75 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ कमाया था, जबकि इससे पहले 2008-09 में उसकी आय 4263.88 करोड़ व शुद्ध लाभ 908.68 करोड़ रुपए था। इस तरह बीते वित्त वर्ष में उसकी आय में 18.12 फीसदी और शुद्ध लाभ में 20.04 फीसदी का इजाफा हुआ था। धंधे के बढ़ने में एचपी व उसकी सब्सिडियरी का महत्वपूर्ण योगदान था।

लेकिन वित्त वर्ष 2010-11 में जनवरी में खत्म पहली तिमाही में कंपनी को एचपी से 10 फीसदी कम आमदनी हुई। नतीजतन आय में 3.5 फीसदी की मामूली वृद्धि के बावजूद उसका शुद्ध लाभ 15.51 फीसदी घट गया। कंपनी ने इस दौरान 1233.50 करोड़ रुपए की आय पर 226.67 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ कमाया है, जबकि साल भर पहले इसी अवधि में उसकी आय 1191.56 करोड़ व शुद्ध लाभ 268.27 करोड़ रुपए था। ये नतीजे 24 फरवरी को आए और अगले चार दिन में 1 मार्च तक इसका शेयर 659 रुपए से 355 रुपए तक गिर गया।

इस धमक की मुख्य वजह यह है कि एचपी ने एम्फैसिस को उसकी सेवाओं को कम दाम दिया। अपनी कंपनी है, कुछ भी कर सकती है। इसीलिए सीएलएसए ने इसे संचालन या गवर्नेंस की समस्या बताया है। कहा जा रहा है कि एचपी जान-बूझकर यह खेल कर रही है ताकि एम्फैसिस के शेयर इतने गिर जाएं कि पब्लिक के पास जो शेयर हैं, उन्हें वह सस्ते में खरीद कर कंपनी को डीलिस्ट करा सके। एचपी 2003 में अपनी अन्य लिस्टेड कंपनी डिजिटल ग्लोबलसॉफ्ट के साथ ऐसा कर चुकी है।

दिक्कत यह है कि एम्फैसिस को 68 फीसदी धंधा एचपी से मिलता है। जैसे, जनवरी 2011 की तिमाही में 1233.50 करोड़ की आय में से 840 करोड़ रुपए की आय एचपी से हुई थी। सवाल उठाया जा रहा है कि क्या एचपी सायास एम्फैसिस को कमजोर करना और दिखाना चाहती है? अगर हां, तो हमें उसके खेल का नजारा दूर से ही देखना चाहिए। अगर नहीं, तो एम्फैसिस में इस समय निवेश का अच्छा मौका है।

उसका ठीक पिछले बारह महीनों का ईपीएस (प्रति शेयर लाभ) 46.06 रुपए है और उसका शेयर अभी 9.75 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है। कंपनी का औसत परिचालन लाभ मार्जिन (ओपीएम) 28 फीसदी रहा है और उसका रिटर्न ऑन इक्विटी (आरओई) 38.65 फीसदी के आकर्षक स्तर पर है। कंपनी 2007 से लेकर अब तक 10 रुपए अंकित मूल्य पर 3 से 4 रुपए का लाभांश देती रही है। 2003 से 2005 तक लगातार तीन साल उसने एक पर एक बोनस शेयर दिए थे। लेकिन तब वह स्वतंत्र थी, अब एचपी की कंपनी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.