और क्या चल रहा है पार्टनर!

हफ्ते भर में कभी फुरसत ही नहीं मिलती कि आपसे कोई सीधी बात हो सके। तीन महीने बीत गए, चौथा बीतने जा रहा है। देखिए, एक बात तो तय मानिए कि हमारा रिश्ता लंबा होने जा रहा है। अर्थकाम को धीरे-धीरे ऐसा बना देना है कि वह हमारी-आपकी दुनिया की देखभाल में सक्षम हो जाए। मेरे एक अभिन्न मित्र ने शुरुआत के वक्त कहा कि चलिए आप अर्थ-काम देखिए, हम धर्म-मोक्ष संभाल लेते हैं। बात मुझे अचानक समझ में आई कि धर्म और मोक्ष का मामला तो परलोक से जुड़ा है। लेकिन अर्थ और काम का वास्ता हमारे जीवन से है, इसी लोक, इसी दुनिया से है।

यहां काम का अर्थ उस काम से नहीं, इस काम से है। रोजी-रोजगार से है। मैं अपने इर्दगिर्द के अनुभव से जानता हूं कि बे-काम होना कैसे इंसान को अंदर से दीमक की तरह खोखला करता चला जाता है और कैसे 22 साल का युवक निरंतर कोशिश करते-करते 42 साल तक पहुंच जाता है। इतना असमर्थ हो जाता है कि मर भी नहीं पाता। इंसानी तत्व सूख जाता है। हर ताने और उलाहना को दुत्कार की तरह सुनकर कभी गुर्राता है, अक्सर अनसुनी कर देता है। यह गलत है, अमानवीय है। भारत जैसी प्राकृतिक संपदा से भरपूर देश में हर हाथ को काम मिलना ही चाहिए। नहीं मिल रहा है, हकीकत है। मिलेगा, हमारा विश्वास है।

अर्थ की दुनिया में हम धीरे-धीरे उतर रहे हैं। आर्थिक व वित्तीय शब्दों की पूरी एक ऑनलाइन डिक्शनरी बनानी है, लेकिन वक्त लगेगा क्योंकि लोग नहीं हैं। अर्थ की नीरस दुनिया की सरसता को समझना है। फाइनेंस की हर गुत्थी को तार-तार करना है। ताकि न तो सरकार हमें आंकड़ों की बाजीगरी से छल न सके और न ही कोई एजेंट हमें किसी बीमा या म्यूचुअल फंड की मिस-सेलिंग कर सके। काम ऊपर से भले आसान दिखता हो, लेकिन है बड़ा कठिन। इसमें समय भी लगेगा और काफी ऊर्जा भी।

अपना मानकर आपसे यही दरख्वास्त करता हूं कि अर्थकाम को ऐसा बनाने में मददगार बनिए ताकि यह सिर्फ अर्थ और वित्त ही नहीं, वाकई लोगों की पूरी दुनिया संवारने का, उसकी देखभाल का माध्यम बन जाए। इसीलिए आपके मन में विचारों की लहर पैदा करने के लिए जगते ही ऋद्धि-सिद्धि में दो लाइन का कंकड़ फेंक देता हूं। जीवन सार में दर्शन संबंधी लेख पेश करते रहने का लक्ष्य है। बाकी तो हफ्ते भर शेयर बाजार और वित्त की दुनिया का हालचाल लाता ही रहता हूं। चलिए, मैंने तो काफी बक-बक कर ली। अब आपकी बारी है। बताइए, पार्टनर और क्या चल रहा है? कोई सुझाव, कोई राय? मैं तो अभी इसी उधेड़बुन में लगा हूं कि अर्थकाम को लंबे समय तक कैसे sustain किया जाएगा? हिसाब-किताब, जोड़-घटाना जारी है। आप अपनी बताइए…

4 Comments

  1. “आर्थिक व वित्तीय शब्दों की पूरी एक ऑनलाइन डिक्शनरी बनानी है, लेकिन वक्त लगेगा क्योंकि लोग नहीं हैं।”

    जो शब्द आज प्रचलित हैं, उन्हें http://hi.wikipedia.org पर होना चाहिए। हिंदी विकिपीडिया पर हर कोई मदद कर सकता है।

  2. अर्थकाम बहुत ही संवेदनशील शीर्षक है। धर्म और मोक्ष इस अवस्था में उतना ही हो पाता है जो संस्कार में मिलता है। धीरे धीरे अर्थ और काम का प्रचुरता होने से ही जीवन के अन्य प्रश्नों पर ध्यान जाता है।

  3. अर्थकाम वाकई साक्षरता और ज्ञान का पीटारा है। कम समय में ही यह वेबसाइट उपयोगी साबित हुई है। इस शिशु को युवा बनने दीजिए यह मैराथन में फर्स्‍ट आएगा।

  4. arthkaam ki site ko two months se padh raha hooo. bahut achha lagata hai, aur bahut si baaten sachi lagati huee dikhaee de rahi hain. maine aapke kahane par HCC ke share me purchase karna suru kar diya hai, lekin maine ek suggestion bhi diya tha ki share ke naam ke sath script code jaroor likhen, taki online investors ko aur paresani naa ho. PARSHURAM

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *