वित्त मंत्री बोले: अर्थव्यवस्था मुश्किल में, पर छिपकली खाने की नौबत नहीं

वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने यह तो माना है कि देश की अर्थव्यवस्था मुश्किल दौर से गुजर रही है, लेकिन उनका कहना है कि अब भी हालत इतनी खराब नहीं है कि हमारे सामने ‘छिपकली खाने’ की नौबत आ गई हो। वित्त मंत्री अंग्रेजी में ही बोलते हैं तो उनका असली कहा पेश है। उन्होंने बुधवार को लोकसभा में 2011-12 के बजट की अनूपूरक मांगों का प्रस्ताव पेश करते हुए लोकसभा में कहा: The economy is in a difficult situation but that does not mean that we shall have to start eating lizards…

अंग्रेजी में ‘ईटिंग लिज़ार्ड’ जैसा कोई मुहावरा नहीं है। बंगाली में हो तो पता नहीं। लेकिन वित्त मंत्री के इन शब्दों का शुद्ध हिंदी में मतलब यही है कि अर्थव्यवस्था की हालत ऐसी नहीं हुई है कि हमें छिपकली खाना शुरू करना पड़े। वैसे, लोकसभा में बुधवार को दोपहर अलग ही नजारा था। नौ दिनों के हंगामे के बाद समूचा विपक्ष वित्त मंत्री को दत्तचित्त भाव से सुन रहा था। वित्त मंत्री अपनी ज्यादातर बात बिना लिखित भाषण की परवाह किए धाराप्रवाह बोल रहे थे और संसद के किसी कोने से कोई शोर नहीं उठ रहा था।

प्रणब मुखर्जी ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय धीमी पड़ती विकास दर, जिद्दी मुद्रास्फीति और बढ़ते राजकोषीय़ के चलते मुश्किल हालत में है। लेकिन इसके मूलभूत पहलू मजबूत हैं। हमारी बचत दर ज्यादा है। हां, यह पहले की तरह 35-36 फीसदी पर नहीं है। लेकिन अब भी 33-33.5 फीसदी है। निवेश की दर भी मंदी के बावजूद 34-35 फीसदी चल रही है। उन्होंने कहा कि इस साल के बजट में पेश किया गया 9 फीसदी विकास दर का अनुमान कोई हवाई ख्वाब नहीं था। लेकिन तेल और अन्य जिंसों के ऊंचे दाम और वैश्विक अर्थव्यवस्था, खासकर यूरोप व अमेरिका में आई सुस्ती ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर तगड़ी चोट की है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार की ऊंची कीमतों के चलते तेल, उर्वरक व खाद्य सब्सिडी काफी बढ़ गई है। बजट में लक्ष्य 40,000 करोड़ रुपए की उर्वरक सब्सिडी का था। लेकिन अब इसका बोझ 90,000 करोड़ रुपए हो गया है। फरवरी में बजट पेश के वक्त भारत द्वारा आयात किए जानेवाले कच्चे तेल का दाम 90 डॉलर प्रति बैरल मानकर चला गया था। लेकिन उसके बाद यह बराबर 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास चल रहा है। इससे तेल मार्केटिंग कंपनियों की अंडर-रिकवरी 1.32 लाख करोड़ रुपए हो गई है।

वित्त मंत्री ने गिनाया कि कैसे बजट में निर्धारित खर्च का बड़ा हिस्सा रक्षा तंत्र, ब्याज अदायगी और सब्सिडी जैसे अपरिहार्य मदों में चला जाता है। उन्होंने साफ किया कि पेट्रोलियम पदार्थों के दामों की ऊंच-नीच के लिए अकेले केंद्र सरकार जिम्मेदार नहीं है। इसका एक तिहाई हिस्सा राज्य सरकारों को चला जाता है। बता दें कि इस समय 14.2 किलोग्राम के एलपीजी सिलिंडर पर तेल कंपनियों को 260 रुपए, एक लीटर डीजल पर 10 रुपए और एक लीटर केरोसिन पर 25 रुपए का नुकसान होता है। वित्त मंत्री ने बताया कि रिफाइनरी से 43 रुपए प्रति लीटर में निकला पेट्रोल दिल्ली में रिटेल आउटलेट पर 73 रुपए का मिलता है। देश में पेट्रोल पर औसत टैक्स 15 रुपए प्रति लीटर का है। लेकिन इसका बड़ा हिस्सा राज्यों को मिलता है।

उन्होंने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था इस साल सितंबर तक की छमाही में 7.3 फीसदी ही बढ़ी है। लेकिन इस दौरान दुनिया में हमारे स्तर के तीन ही देश हमसे ज्यादा रफ्तार से बढ़े हैं। तुर्की की विकास दर 10 फीसदी और चीन व मेक्सिको की विकास दर 9 फीसदी रही है। लेकिन हमें याद रखना होगा कि 2004-05 से 2007-08 के दौरान हमारी आर्थिक विकास दर 9 फीसदी रही थी। 2008-09 में यह दर 8 फीसदी और 2010-11 में 8.5 फीसदी रही है। एक समय ऐसा था जब इतनी विकास दर जश्न का विषय बन जाती। 1951 से 1979 तक हमारी विकास दर 3.5 फीसदी रही। 1980 के पूरे दशक में हम 5 फीसदी की गति से बढ़े। 1990 के दशक में हमारी औसत विकास दर 5.6 फीसदी रही थी।

उन्होंने लोकसभा में अपने भाषण के अंतिम दौर में कहा, “मैं मानता हूं कि हालात सुधर सकते हैं, बशर्ते संस्थाएं मजबूत की जाए, संसद काम करे, अगर यह सदन बहस करे और फैसले करे, जिसके लिए यह बना है। आप देखेंगे कि तब पूरा माहौल बदल जाएगा।” वित्त मंत्री के बोलने के बाद लोकसभा ने ध्वनिमत से बजट की अनुपूरक मांगों को पारित कर दिया।

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