बिजली कंपनियां बिजली नहीं घाटा बनाती हैं

हरियाणा के उपभोक्ता, सरकार और उद्योग महंगी बिजली के जबरदस्त कुचक्र में फंस गये हैं। बिजली कंपनियों का घाटा पिछले चार गुना बढ़ाकर पिछले 1400 करोड़ पर पहुंच गया है। राज्य सरकार अपना खजाना फूंक कर बाजार से दोगुनी अधिक कीमत में बिजली खरीद रही है। इसी को कहते हैं घर फूंक कर रोशन करना। कर्ज लेकर घी पीना। राज्य की बिजली कंपनियां बिजली की जगह घाटा बना रही हैं। बिजली क्षेत्र की यह बदहाली आने वाले वर्षो में हरियाणा को महंगी पड़ेगी। खजाना पहले से ही भारी घाटे के दबाव से दबा जा रहा है।

नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (सीएजी) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि हरियाणा के लोगों की यह गरमी बिजली की जबर्दस्त कमी में बीतेगी। राज्य सरकार का खजाना भी महंगी बिजली का बोझ शायद ही उठा पाएगा। सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक महंगी बिजली खरीद कर सस्ती बेचने और अपनी उत्पादन इकाइयों की बदहाली के कारण अप्रैल 2007 से जून 2008 के दौरान राज्य के खजाने पर 498.48 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ा है।

राज्य सरकार बाजार से 6.22 रुपए प्रति यूनिट की बिजली खरीदती है। यहां तक कि नेशनल ग्रिड से हरियाणा को उसके कोटे की जो बिजली मिलती है वह भी बेहद महंगी है। इधर राज्य की इकाइयां 3.15 रुपए प्रति यूनिट की लागत पर बिजली बना रही हैं। जबकि उपभोक्ताओं लेकिन 2.91 रुपए प्रति यूनिट की दर से बिजली मिलती है।

राज्य की दोनों बड़ी बिजली कंपनियां 1399 करोड़ रुपए के भारी घाटे के बोझ से दब गई हैं। सबसे बुरा हाल उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम लिमिटेड का है। कंपनी का घाटा पिछले चार सालों में 285 करोड़ रुपये से बढ़कर 1107 करोड़ रुपये पहुंच गया। वहीं दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम का हाल और भी निराला है। कंपनी 2005-06 में 18 करोड़ रुपए के लाभ में थी, लेकिन 2008-09 में कंपनी 265 करोड़ रुपए के घाटे में चली गई।

रिपोर्ट कहती है कि बिजली घरों में मानक से अधिक कोयला और तेल की खपत होती नहीं की जाती है, जिस पर कोई नियंत्रण नहीं है। वित्तीय कुप्रबंधन के अलावा बिजली उत्पादन व वितरण में निगरानी का सख्त अभाव है। नये बिजली घरों की स्थापना का ठेका निजी कंपिनयों का मुंह देखकर दिया जाता है। घाटे की वजह यह भी है। (एस पी सिंह)

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