विदेशी हम पर फिदा, देशी करें दूर!

उधर डॉलर का जनक अमेरिकी क्रेद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व घोषणा करता है कि वो जनवरी से सिस्टम में 85 अरब के बजाय 75 अरब डॉलर के ही नोट डालेगा, इधर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफआईआई) भारतीय शेयरों की खरीद घटाने के बजाय बढ़ा देते हैं। बुधवार की घोषणा के अगले दिन गुरुवार को एफआईआई ने हमारे कैश सेगमेंट में 2264.11 करोड़ रुपए की शुद्ध खरीद की। कल शुक्रवार को भी उन्होंने शुद्ध रूप से 990.19 करोड़ रुपए के शेयर खरीदे।

दूसरी तरफ घरेलू निवेशक संस्थाएं (डीआईआई), जिनमें भारतीय म्यूचुअल फंड, बीमा कंपनियों व बैंक वगैरह शामिल हैं, लगातार, तकरीबन हर दिन, बेचे जा रही हैं। गुरुवार को उनकी शुद्ध बिक्री 41.59 करोड़ रुपए और शुक्रवार को 247.95 करोड़ रुपए की रही। एफआईआई चालू साल 2013 में जनवरी से 20 दिसंबर तक भारतीय शेयरों में शुद्ध रूप से 110,792.50 करोड़ रुपए लगा चुके हैं। अकेले दिसंबर में अब तक उन्होंने 13,742.50 करोड़ रुपए डाले हैं। वहीं डीआईआई ने दिसंबर में अब तक 2045.08 करोड़ रुपए के शेयर बेचे हैं और इस साल जनवरी से अब तक उनकी शुद्ध बिकवाली 72,929.50 करोड़ रुपए की रही है। यह पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी के आधिकारिक और अद्यतन आंकड़े हैं।

सीधी-सी बात है कि कोई भी निवेशक तभी खरीदता है जब उसे लगता है कि शेयर के भाव अभी ऊपर चढेंगे। इसलिए एफआईआई अगर खरीदे जा रहे हैं तो इसका मतलब है कि उन्हें कहीं न कहीं उम्मीद है कि भारतीय शेयर अभी काफी ऊपर जाएंगे। दूसरी तरफ कोई निवेशक किसी शेयर को तभी बेचता है, जब उसे लगता है कि आगे इसके भाव गिरनेवाले हैं। इसलिए अगर भारतीय म्यूचुअल फंड व अन्य संस्थाएं बेचे जा रही हैं तो उनको कहीं न कहीं लगता होगा कि हमारे शेयरों के भाव आगे गिरनेवाले हैं। यह उलटबांसी क्यों कि विदेशी भारत की लिस्टेड कंपनियों को लेकर आशावान हैं, जबकि देशी संस्थाओं में उनके भविष्य को लेकर निराशा भरी हुई है? ऐसा न होता तो वे इन कंपनियों के शेयरों को इस तरह बेचते ही क्यों?

कुछ हद तक इस सवाल का जवाब तलाशते हुए एक्सिस कैपिटल के सीईओ व प्रबंध निदेशक निलेश शाह ने मिंट अखबार में हाल ही में एक दिलचस्प लेख लिखा है। उन्होंने 30 सितंबर 2013 तक की स्थिति बयां की है कि बीएसई-500 सूचकांक में शामिल कंपनियों में एफआईआई का मालिकाना 20.7 फीसदी से ऊपर जा चुका है। यह स्थिति तब है कि जब एफआईआई को भारत में निवेश की इजाजत इक्कीस साल पहले नवंबर 1992 से ही मिली है। सेबी के मुताबिक तब से लेकर अब तक भारतीय इक्विटी में एफआईआई का शुद्ध निवेश 6,83,542.25 (1457.12 अरब डॉलर) का हो चुका है।

अपने निवेश की बदौलत आज एफआईआई भारतीय कंपनियों में प्रवर्तकों के बाद दूसरी सबसे बड़ी मालिक बन चुकी हैं। एक मोटे अनुमान के मुताबिक हमारी लिस्टेड कंपनियों में प्रवर्तकों की हिस्सेदारी 58 फीसदी, एफआईआई की हिस्सेदारी 22 फीसदी, डीआईआई की हिस्सेदारी 12 फीसदी और रिटेल निवेशकों की हिस्सेदारी करीब 8 फीसदी है। निलेश शाह कहते हैं कि जिस रफ्तार से एफआईआई भारतीय कॉरपोरेट जगत में स्वामित्व हासिल कर रहे हैं, वह कुछ सदियों पहले ईस्ट इंडिया कंपनी की गति से भी कहीं ज्यादा तेज़ है।

सवाल उठता है कि विदेशी निवेशक हमारे शेयरों पर इतने फिदा क्यों हैं? घरेलू निवेशकों की बिकवाली तो समझ में आती है। कारण है – आर्थिक विकास की घटती दर, घटता निवेश, सरकार का बेलगाम घाटा, घटती घरेलू बचत जिसकी भरपाई विदेशी स्रोतों से हो रही है और नतीजतन चालू खाते की घाटे नाजुक हालत, ऊंची मुद्रास्फीति और ब्याज दर, रुपए का कमज़ोर होते जाना, आदि-इत्यादि। यकीनन एफआईआई की आंखों से ये समस्याएं ओझल नहीं. हैं। फिर भी एफआईआई इसलिए खरीद रहे हैं क्योंकि दुनिया के तमाम देशों की तुलना में भारतीय निवेश पर ज्यादा रिटर्न मिल रहा है। वे तमाम विकल्पों में से भारत को चुन रहे हैं। दूसरी तरफ भारतीय संस्थाओं के पास कोई बेहतर विकल्प नहीं है तो वे बेच रही हैं।

एफआईआई में तेज़ी का नजरिया उनके प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष अनुभव का नतीज़ा है, जबकि डीआईआई में मंदी की धारणा उनके प्रत्यक्ष अनुभव का नतीज़ा है। इसलिए जहां एफआईआई खरीद रहे हैं, वहीं डीआईआई बेच रहे हैं। निलेश शाह की कंपनी एक्सिस कैपिटल ने एक अध्ययन किया है जिससे जाहिर होता है कि एफआईआई को भारतीय निवेश पर दुनिया में और जगहों की बनिस्बत ज्यादा रिटर्न मिला है। यह रिटर्न रुपए में ही नहीं, डॉलर में ज्यादा है, भले ही डॉलर के सापेक्ष रुपए के कमज़ोर होने से उनका डॉलर रिटर्न घट गया हो। एक्सिस कैपिटल के इस अध्ययन में उन विदेशी कंपनियों को शामिल किया गया है जिनकी इकाइयां भारत में ही हैं। और, यह नतीज़ा हिंदुस्तान यूनिलीवर, प्रॉक्टर एंड गैम्बल व कॉलगेट जैसी एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स) कंपनियों से लेकर दवा, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग व फाइनेंस कंपनियों तक पर लागू होता है। इसमें उन्होंने देशी से विदेशी कंपनी बन चुकी ऑटो कंपनी मारुति सुज़ुकी का खास उदाहरण दिया है। निलेश शाह का यह लेख आपको भी ज़रूर पढ़ना चाहिए।

वैसे एफआईआई की तरह आपको भी निवेश से कमाई करनी है तो आप हमारी तथास्तु सेवा का लाभ उठा सकते हैं जिसमें हम मात्र 200 रुपए में हर महीने चार संभावनामय कंपनियां पेश करते हैं। 2000 रुपए खर्च करें तो आपको साल भर में 208 निवेशयोग्य कंपनियां मिल जाएंगे। इनमें लॉर्जकैप, मिडकैप व स्मॉलकैप कंपनियां शामिल हैं जिनमें से अपने हिसाब से आप चयन कर सकते हैं। इतनी सस्ती सेवा, वो भी अपनी भाषा हिंदी में आपको कहीं नहीं मिल सकतीं। बाकी मर्जी आपकी।

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